नब्बे के दशक की बर्बरता हो या 2 जून 2021 को हुई राकेश पंडिता की हत्या, सभी घटनाएं बार-बार एक ही सवाल करती हैं...आखिर हमारा कसूर क्या था? आखिर किस जुर्म की सजा मिली। यही बर्बरता और दर्द राकेश पंडिता के परिवार को कचोट रहा है। पंडिता की हत्या ने नब्बे और नादिमर्ग के पुराने घावों को फिर कुरेद दिया है। मृतक के परिजनों का बुरा हाल है। रोते-बिलखते लोग एक ही सवाल कर रहे हैं कि आखिर आतंकियों ने राकेश पंडिता को क्यों मारा, उन्होंने किसी का क्या बिगाड़ा था।
सवाल-आखिर हमारा कसूर क्या था?: कश्मीरी पंडितों पर बरपाए गए कहर की झकझोर देने वाली घटनाएं
कश्मीर में 1989-90 में आतंकवाद चरम पर आते ही कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम शुरू हो गया। बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित जान बचाकर घाटी से पलायन कर गए। फिर भी नादिमर्ग में कश्मीरी पंडितों के दस परिवार वहीं बने रहे। समय गुजरता गया 23 मार्च, 2003 को गांव में दिन के समय आतंकी देखे गए। इसकी सूचना पुलिस को दी गई। बताया जाता है कि पुलिस मौके पर पहुंची ही नहीं थी।
इसी रात हथियारों से लैस आतंकी गांव में घुसे। इसके बाद आतंकियों ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। गांव के कश्मीरी पंडितों को कतार में खड़ा किया गया। जिसमें महिला, बच्चे और पुरुष थे। देखते ही देखते गोलियों की बौछार शुरू हो गई। हर ओर दिल दहला देने वाली चीखें थीं। थोड़ी देर बाद सन्नाटा पसर गया। हर तरफ लाशें थीं। सारा गांव श्मशान बन चुका था।
किसी की आंखों के सामने भाई को मार दिया, तो किसी की बहू-बेटी की आबरू लूट ली गई। जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने पर आतंकियों ने एक नर्स को आरे से जिंदा चीर दिया। जान से मारने की धमकी के बाद घर में चावल के ड्रम में छिपे एक पंडित को गोलियों से भून दिया।
इसके बाद आतंकियों ने उसकी पत्नी को खून से सने चावल पकाकर खिलाए। कश्मीर छोड़कर भाग जाने के लिए पंडितों के घरों के बाहर और सड़कों पर पोस्टर चस्पा कर दिए गए। 19 जनवरी, 1990 के दिन श्रीनगर में लाखों लोगों का जुलूस निकाला गया। नारे लगे- हम क्या चाहते आजादी, कश्मीरी पंडितों भाग जाओ, औरतों को छोड़ जाओ।