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कब जान चली जाए पता नहीं, एलओसी के आखिरी गांव जबड़ा-बटाड में पाक गोलाबारी से खौफ

Sun, 29 Sep 2019 01:50 AM IST
Pranjal Dixit अमृतपाल सिंह बाली, जबड़ा, उड़ी सेक्टर
अमृतपाल सिंह बाली, जबड़ा, उड़ी सेक्टर Published by: Pranjal Dixit Updated Sun, 29 Sep 2019 01:50 AM IST
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ground story of last village of India on border near uri sector jammu kashmir
एलओसी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
खूबसूरती और हरियाली के लिए जाने जाते शम्साबादी पहाड़ियों में बसे गांव जबड़ा-बटाड की फिजा में आजकल बारूद की दुर्गंध फैली हुई है। उत्तरी कश्मीर के उड़ी सेक्टर से सटी एलओसी के आखिरी गांव के लोग पाकिस्तान की तरफ से लगातार की जा रही गोलाबारी से काफी दहशतजदा हैं। इन्हें डर है, पता नहीं कब जान चली जाए। पाकिस्तानी सेना की पोस्ट से मात्र 750 मीटर दूर स्थित इस गांव के लोग अगर यहां टिके हुए हैं तो सिर्फ भारतीय सेना के सहारे। अमर उजाला की टीम ने इस गांव का दौरा कर हकीकत जानी। चारों तरफ तबाही के मंजर, टूटे घर और खौफजदा चहरें अपनी दास्तां ब्यां कर रहे थे।  
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एलओसी - फोटो : अमर उजाला
400 की आबादी वाले इस गांव में करीब 45 मकान हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार इस साल मार्च से ही सीज फायर वायलेशन की घटनाएं बढ़ी हैं। 5 अगस्त के बाद से इनमें काफी तेजी आई है। पाकिस्तान कब गोलाबारी कर दे, कब जान चली जाए पता नहीं।
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एलओसी - फोटो : अमर उजाला
मोहम्मद कयूम खटाना ने बताया कि हमें यहां बहुत तकलीफ होती है। घरों से बाहर नहीं निकल पाते हैं। न ही खेतों में जा सकते हैं। गोलाबारी से करीब 8 मकान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं जबकि 20 से अधिक मकानों को हल्का नुकसान पहुंचा है। पाकिस्तान लगातार रिहायशी इलाकों को निशाना बना रहा है। आलम दीन ने बताया कि 9 सितंबर को सबसे ज्यादा गोलाबारी हुई थी। पाकिस्तान ने करीब 500 से अधिक गोले दागे। सुबह हम सोये हुए थे, तभी घर की छत पर गोला गिरा और मकान पूरा तबाह हो गया। खुदा का शुक्र है परिवार के सभी सदस्य बच गए। अब सर छिपाने को छत नहीं है। 
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एलओसी - फोटो : अमर उजाला
कयूम ने बताया कि ऐसे तनाव में केवल सेना ही उन तक पहुंचती है और उनके परिवारों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाती है। घायल होने पर अस्पताल भी ले जाती है। सेना के एक अधिकारी के मुताबिक अभी भी इलाके में कई अनफटे गोले ज़मीन में दबे पड़े हैं। मक्की की कटाई के बाद इन्हें डिफ्यूज किया जाएगा।  

 
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- फोटो : अमर उजाला
पनाह के लिए बंकर बनाने की मांग
गोलाबारी से मासूम की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। चौथी कक्षा में पढ़ने वाली तबस्सुम ने बताया कि यहां गोलाबारी से बहुत डर लगता है। लोगों ने माग की है कि उन्हें बंकर बनाकर दिए जाएं ताकि गोलाबारी में पनाह ले सकें। अमर उजाला की टीम ने श्रीनगर से सुबह करीब 8 बजे सफर शुरू किया। गाड़ी में 3 घंटे के सफर के बाद बाद टीम उड़ी ब्रिगेड चेक पॉइंट पहुंची। फिर करीब एक घंटे का पहाड़ी सफर तय कर कमलकोट जोकि एलओसी के काफी करीब है। इसके बाद करीब 5 किमी. पैदल चल कर एलओसी से सटे आखिरी गांव जबड़ा-बटाड पहुंची।
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