टोक्यो पैरालंपिक की शूटिंग प्रतियोगिता में दो पदक जीतकर इतिहास रचने वाले सिंहराज अधाना की इस कामयाबी के पीछे उनकी लगन और कड़ी मेहनत है। पिता प्रेम सिंह अधाना ने बताया कि सिंहराज ने लॉकडाउन में भी अभ्यास करना नहीं छोड़ा। खुद के स्कूल में ही शूटिंग रेंज बनाई और अभ्यास में जुटा रहा। इस शूटिंग रेंज में स्वर्ण जीतने वाले मनीष नरवाल ने भी अभ्यास किया।
कामयाबी की इबारतः फरीदाबाद के सिंहराज और मनीष ने लाकडाउन में भी नहीं छोड़ा अभ्यास, स्कूल में स्थापित की शूटिंग रेंज
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सिंहराज के सपने पूरे करने के लिए पत्नी ने बेच दिए थे गहने
परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सिंहराज को जबरदस्त संघर्ष करना पड़ा। उनकी पत्नी ने पति के सपने पूरे करने के लिए अपने गहने तक बेच दिए थे। सिंहराज ने विश्वकप में स्वर्ण पदक जीतकर ओलंपिक कोटा हासिल किया था। परिवार की आर्थिक हालत ठीक न होने के बावजूद कोरोना के बाद अनलॉक शुरू होते ही सिंहराज ने 10 मीटर व 50 मीटर एयर पिस्टल की रेंज तैयार कराई। इस शूटिंग रेंज के लिए सिंहराज को वर्ष 2018 में एशियन गेम्स में सफलता पर प्रदेश सरकार से मिली इनामी राशि काम में आई।
खेल ही नहीं जन्मभूमि और कर्मभूमि भी एक
मनीष और सिंहराज शूटिंग से तो जुड़े हुए है ही उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में भी बहुत हद तक समानता है। दोनों की जन्मभूमि ऊंचा गांव है, हालांकि सिंहराज मूलतः तिंगाव निवासी है और मनीष नरवाल का पैतृक गांव सोनीपत का कथूरा गांव है। हालांकि वे अब परिवार समेत साहूपुरा गांव में रहते हैं। दोनों शूटरों ने काफी समय ऊंचा गांव में बिताया था। एक साथ इतिहास रचने से पहले ही किस्मत ने दोनों को न सिर्फ एक सा माहौल दिया बल्कि एक दूसरे से भी मिलवाया। प्रेमसिंह अधाना दोनों को अपना बेटा मानते हैं।
भाई उधम सिंह ने बताया कि सिंहराज को निशानेबाजी के कोच ओमप्रकाश ने प्रशिक्षित किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोच सुभाष आहूजा सहित एक अन्य कोच ने काफी बारीकियां सिखाई हैं। वर्ष 2018 के बाद से सरकारी मदद के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के लिए हर संभव मदद व ट्रेनिंग ले रहे हैं। अभ्यास के दौरान भी ओलंपिक में इस्तेमाल होने वाली शूटिंग किट को ही काम में लिया। यही कारण है कि सिंहराज ने पैरालंपिक में शानदार प्रदर्शन किया।
ऊंचा गांव में किराए पर रहता था मनीष का परिवार
मनीष के पिता दिलबाग सिंह ने बताया कि वह 1993 में सोनीपत से फरीदाबाद आए थे। सबसे पहले बल्लभगढ़ के ऊंचा गांव में ही किराये पर रहना शुरू किया। वहीं मनीष का जन्म हुआ। दोनों ने काफी दिन एक साथ अभ्यास भी किया। हालांकि वर्ष 2018 में एशियन खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद उनके परिवार ने गांव साहूपुरा में खुद का मकान ले लिया और वहां वर्कशॉप शुरू की। साथ ही बेटे के अभ्यास के लिए शूटिंग रेंज स्थापित कर दी।
कोच ने बदला मनीष के खेल का अंदाज
मनीष की मां संतोष बतातीं हैं कि उनका बेटा वर्ष 2016 से शूटिंग का अभ्यास कर रहा है। वह शुरू से ही इस खेल में अच्छा था, स्थानीय स्तर पर कोच राकेश ने उसके कौशल को खूब तराशा है। वह अहसानमंद हैं कि कोच ने उनके बेटे के कौशल को समझा और दक्षता हासिल करने के लिए और मजबूती से तैयार किया। कोच राकेश से मिलकर ही उन्हें लगा कि मनीष अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बन सकता है। महंगा खेल होने के बावजूद उन्होंने बेटे के लिए संसाधन जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।