शहीद मेजर आशीष धौंचक के परिजनों ने जवानों की वर्दी बुलेट प्रूफ बनवाने की मांग की है। मां कमला देवी ने कहा कि उसने इकलौते बेटे को पालकर देश को सौंप दिया था। सरकार बुलेट प्रूफ जैकेट घुटनों तक देती तो इस तरह से जवान शहीद नहीं होते। सरकार को इसमें कुछ करना चाहिए। परिवार में चाचा अमर सिंह ने भी सरकार से जवानों की वर्दी बुलेट प्रूफ बनवाने की मांग की है। एक नेता की सुरक्षा को जवान घेरा बनाकर हर समय तैनात रहते हैं, लेकिन जवान की सुरक्षा की तरफ नेता ध्यान नहीं देते। यह कड़वा सच है, जिस पर सरकार को काम करना चाहिए।
शहीद मेजर आशीष धौंचक: सामने आई शहादत की असली वजह, परिजनों ने सरकार से की सेना के लिए बुलेट प्रूफ वर्दी की मांग
जांघ में दो गोली लगने के बाद भी लड़ते रहे मेजर, अधिक खून बहने से हुई शहादत
शहीद मेजर आशीष धौंचक को आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में दो गोली लगी थी, जो जांघ में लगकर दूसरी तरफ निकल गई। इसके बाद साथियों ने उन्हें वापस लाने का प्रयास किया, लेकिन वे पीछे हटने को तैयार नहीं हुए और दुश्मनों को मारकर ही वापस चलने की बात कही। इस दौरान खून अधिक बहने से उनकी स्थिति नाजुक होती गई। फिर उन्हें प्राथमिक उपचार के लिए जम्मू अस्पताल लाया गया पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। यही कारण है कि परिवार ने रक्षामंत्री से जवानों की पूरी वर्दी बुलेटप्रूफ करने की मांग उठाई है।
विदित हो कि गांव बिंझौल निवासी मेजर आशीष धौंचक 19-राष्ट्रीय राइफल अनंतनाग में तैनात थे। उनका यहां दो साल पहले ही मेरठ से तबादला हुआ था। एक सूचना के आधार पर उन्होंने कर्नल मनप्रीत और बाकी टीम के साथ सर्च अभियान शुरू किया था। तभी दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के कोकरनाग क्षेत्र में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ हो गई।
कर्नल मनप्रीत को गोली लगने के बाद मेजर आशीष धौंचक टीम की अगुवाई कर रहे थे। इस बीच एक गोली उनकी जांघ में लगी। इस पर साथी जवानों ने उनको पीछे लाने का प्रयास किया, लेकिन मेजर आशीष ने लड़ते रहने के आदेश दिए। फिर दूसरी गोली भी उनकी जांघ में जा लगी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद भी वे दुश्मनों से लड़ते रहे। मेडिकल टीम और जवानों ने उनको वापस लाने का प्रयास किया। हालत बिगड़ने पर उनको जम्मू अस्पताल लाया गया, तब तक उनका खून ज्यादा बह चुका था। आशीष के परिवार में चाचा अमर सिंह ने बताया कि उनको अपने बेटे की शहादत पर गर्व है। वह दो गोली लगने के बाद भी दुश्मनों से लड़ता रहा।
20 अक्तूबर को आना था छुट्टी
मेजर आशीष धौंचक को 20 अक्तूबर को छुट्टी आना था। वे इसके बाद 23 अक्तूबर को अपने नए घर में प्रवेश करते। वे जन्मदिन के साथ ही अपने पिता लालचंद की सेवानिवृति पार्टी का बड़ा कार्यक्रम करना चाहते थे। इसी बीच उनकी शहादत हो गई। मेजर आशीष की दिलेरी और देश सेवा के प्रति जज्बे की बात उसके परिजन व दोस्त भी करते हैं। इससे पहले आशीष ने स्कूली शिक्षा के समय ही सेना में जाने का लक्ष्य तय कर लिया था। उन्होंने बीटेक करने के बाद भी किसी कंपनी या सेना की इंजीनियरिंग लाइन में जाने की बजाय सामान्य वर्ग में गए। उनके चचेरे भाई मेजर विकास इंजीनियरिंग विंग में हैं।