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पांडवों से जुड़ा है पिंजौर की बावड़ियों का इतिहास, आज भी आता है पानी
अरविंद बाजपेयी/डीके चौहान, अमर उजाला/संवाद न्यूज एजेंसी, पंचकूला (हरियाणा)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Fri, 12 Feb 2021 05:43 PM IST
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पिंजौर में बनी बावड़ी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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शिमला रोड पर स्थित हरियाणा के पिंजौर से पांडवों का इतिहास जुड़ा है। यहां कई ऐतिहासिक बावड़ियां हैं। लोगों में ऐसी मान्यता है कि इन बावड़ियों का निर्माण पांडवों ने कराया है। अज्ञातवास के अंतिम दिनों में पांडवों ने यहां 365 बावड़ियां खोदी थी। कहा जाता है कि पांडव हर रोज नई बावड़ी खोदते थे, क्योंकि उनको डर था कि कहीं कौरव किसी बावड़ी में जहर मिलाकर मार न दें।
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पिंजौर में बनी बावड़ी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पिंजौर में पांडवों ने अज्ञातवास के अंतिम दिन बिताए थे। उन्होंने यहां करीब 365 बावड़ियां खोदी थीं। अब इसमें से सिर्फ 15 बावड़ी ही बची हैं। इनमें अब भी पानी आता है। पिंजौर के निवासियों के अनुसार इन बावड़ियों का महत्व कम नहीं है।
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बावड़ी
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
मान्यता यह है कि अब भी अगर इन बावड़ियों का पानी यदि घर में रखा जाए तो वह खराब नहीं होता है। पिंजौर में यह बावड़ियां कुएं की जितनी गहरी नहीं है। कभी कभी इसमें इतना पानी आ जाता है कि कोई भी आराम से पानी निकाल लेता है।
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बावड़ी
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पिंजौर में काफी समय तक इन बावड़ियों के पानी का उपयोग किसानों द्वारा खेती करने के लिए किया जाता रहा। यहां के लोग कहते हैं कि कुछ बावड़ियों की जमीन पर कब्जा कर लिया गया और कुछ बाकी हैं। इनके सौंदर्यीकरण को लेकर लगातार प्रशासन से संपर्क किया जा रहा है।
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पिंजौर में बनी बावड़ी।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
गर्मियों में जहां एक ओर पूरा पिंजौर पानी की किल्लत से जूझता है तो वहीं इन बावड़ियों में पानी भरा रहता है। लोगों का कहना है कि यदि इनकी सफाई और उनका सौंदर्यीकरण करवा दिया जाए तो इन सभी 15 स्थानों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। पिंजौर के रहने वाले प्रदीप ने बताया कि उन्होंने इन बावड़ियों के सौंदर्यीकरण के लिए लिखा था। इसके साथ ही वकील विजय बंसल ने भी बावड़ियों के सौदर्यीकरण के लिए लिखा है।
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