फसलों की सिंचाई के लिए पानी अति आवश्यक है, लेकिन अत्यधिक दोहन के चलते सिंचाई के अलावा अब पेयजल पर भी संकट गहरा रहा है। जल प्रबंधन न होने से करीब 70 प्रतिशत सिंचाई जल व्यर्थ बह रहा है। यह गंभीर विषय है। पानी का उचित प्रबंधन और संरक्षण करके ही आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रखा जा सकता है। यह कहना है हरियाणा के हिसार में स्थित चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कांबोज का।
Haryana: HAU में कृषि मेले का उद्घाटन, 10 हजार किसान पहुंचे, प्रदेश के प्रगतिशील किसान सम्मानित
कुलपति प्रो. बी.आर. काम्बोज ने कहा कि जल का संरक्षण करके ही आने वाली पीढ़ियों के लिए इसको सुरक्षित रखा जा सकता है। कुलपति ने कहा कि प्रबंधन नहीं होने से 70% सिंचाई जल बर्बाद हो रहा है।
किसानों ने खरीदे रबी फसलों के बीज
मेला स्थल पर हकृवि की ओर से स्थापित किए गए बीज बिक्री केन्द्र से किसानों ने भारी मात्रा में विभिन्न रबी फसलों के बीज खरीदे। उन्होंने मिट्टी-पानी जांच सेवा का लाभ उठाते हुए अपने खेत की मिट्टी व पानी की जांच करवाई।
नई तकनीक के साथ किया कदमताल और बन गए प्रगतिशील किसान
नई तकनीकी का प्रयोग कर खेती को भी लाभकारी बनाया जा सकता है। प्रदेश के किसान परंपरागत खेती छोड़कर नई तकनीक के साथ कदमताल कर प्रगतिशील किसान बन गए हैं। एचएयू के कृषि मेले में सम्मानित किसानों ने इसे साबित किया है। हिसार के डॉ. विकास वर्मा ड्राई ऑस्टर मशरूम के विशेषज्ञ बन गए हैं तो वहीं सिरसा के रमेश भादू ने ड्रिप सिस्टम से सिंचाई कर कपास में रिकॉर्ड उत्पादन किया है।
फतेहाबाद के राधेश्याम ने धान की बिजाई कर पानी की खपत को लगभग 80 प्रतिशत तक कम किया है तो वहीं भिवानी के अशोक शर्मा बागवानी में नई राह दिखा रहे हैं। अलग-अलग गांवों के इन किसानों ने खेती तो परंपरागत ढंग से ही शुरू की थी, लेकिन थोड़े से बदलाव ने इन्हें संपन्न किसानों की श्रेणी में ला दिया है।
फतेहाबाद के किसान राधेश्याम ने बताया कि उनके गांव में अधिकांश किसान परंपरागत विधि से धान की खेती करते थे। हमने नई तकनीक अपनाई और धान की रोपाई की जगह बिजाई की। इससे एक तो खेत में पानी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती, दूसरे कम पानी में ही सिंचाई भी हो जाती है। इस विधि से धान की खेती में करीब 80 फीसदी तक पानी की बचत होती है।
भिवानी के किसान अशोक शर्मा ने बागवानी में नया प्रयोग किया। खेत में कम्पोस्ट की मात्रा बढ़ाने व सिंचाई की नई विधियों को अपनाने से न केवल उत्पादन बढ़ा, बल्कि लागत में भी कमी आई है। हिसार के विकास वर्मा ने भी मशरूम की खेती में नया प्रयोग किया और अब तो इनकी कंपनी दूसरे किसानों को मशरूम उत्पादन की ट्रेनिंग देने लगी है। खेती में आ रहा यह नया बदलाव सुखद है।
छिड़काव से सिंचाई करने पर पानी, समय और पैसों की होगी बचत
बढ़ते जल संकट को देखते हुए इसके संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। इस बार एचएयू के कृषि मेले की थीम भी जल संरक्षण विषय को ही रखा गया। मेले में जल संरक्षण के लिए जिस तकनीकि पर सबसे अधिक जोर था वह स्प्रिंकलर (छिड़काव) व टपका विधि से सिंचाई का है। इस विधि से ऊंचाई वाले खेतों में कम लागत व कम पानी में अच्छी सिंचाई होती है। सबसे खास बात यह है कि सरकार अभी इस विधि से सिंचाई के लिए किसानों को करीब 80 प्रतिशत तक अनुदान दे रही है।
सूक्ष्म सिंचाई और नहरी क्षेत्र विकास प्राधिकरण (मिकाडा) की तरफ से कृषि मेले में लगाए गए स्टॉल पर सिंचाई की इस सबसे नवीन व उन्नत प्रणाली के बारे में किसानों को जागरूक किया गया। यहां मौजूद कर्मियों ने बताया कि हिसार, भिवानी, करनाल समेत प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में अब किसान इसका प्रयोग करने लगे हैं।
न्यूनतम एक एकड़ और अधिकतम 12 एकड़ तक की खेती करने वाले किसानों को इस पर अनुदान दिया जाता है। किसान अपनी जरूरत के अनुसार इस योजना का लाभ उठा सकते हैं। इस योजना के तहत कम से कम चार किसान मिलकर सामुदायिक तालाब का निर्माण करा सकते हैं। इस तालाब के निर्माण पर किसानों को 85 प्रतिशत तक अनुदान मिलता है। इसके अलावा सोलर पंप योजना के जरिए भी किसान इस योजना का लाभ ले सकते हैं। किसानों को ऑनलाइन आवेदन करना होगा।
ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त रखें
सिंचाई के साथ-साथ किसानों को जलभराव से होने वाले नुकसान के बारे में भी कृषि मेले में जागरूक किया गया। जल निकासी के लिए बने स्टॉल पर किसानों को बताया गया कि खेतों के बीच बने ड्रेन को खाली रखें। जहां ड्रेनेज सिस्टम नहीं होगा, वहां बारिश में जलभराव की समस्या आएगी। इसके अलावा जलभराव वाले क्षेत्र में ऐसी फसल की बिजाई करें, जिसमें अधिक पानी की जरूरत पड़ती हो।
लंपी बीमारी पर नियंत्रण पाने का कर रहे प्रयास : डॉ. विनोद
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि व लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय (लुवास) के कुलपति डॉ. विनोद कुमार वर्मा ने जल को संरक्षित करने की आवश्यकता जताई। उन्होंने किसानों को खेती के साथ-साथ पशुपालन अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह दो-तिहाई ग्रामीण समुदाय को आजीविका प्रदान करता है। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में गोवंश में फैली लंपी स्किन बीमारी का उल्लेख करते हुए कहा कि हरियाणा सरकार और लुवास द्वारा इस रोग पर नियंत्रण पाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विस्तार शिक्षा निदेशक एवं कृषि मेला संयोजक डॉ. बलवान सिंह मंडल ने किसानों के कल्याण के लिए विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जा रही विस्तार गतिविधियों पर प्रकाश डाला।