मुख्यमंत्री अभ्युदय कोचिंग में पढ़ाई का मौका पाने वाले छात्रों के लिए यह अवसर इस लिहाज से बेहद अहम है कि जिस मंजिल का सपना उनकी आंखों में पल रहा है, उन्हें मार्गदर्शन देने वाले गोरखपुर जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के पास उस मंजिल को पाने का अनुभव है। ये अधिकारी खुद दुश्वारियों में तप कर कुंदन हुए हैं। आज जिस मुकाम पर हैं, यहां तक पहुंचने के लिए कई बाधाएं पार कीं, पर कभी धैर्य नहीं खोया। अब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों को सफलता का मंत्र दे रहे हैं। वे बता रहे हैं कि लक्ष्य तय करके आगे बढ़ें। कोई भी कठिनाई आए, लेकिन हार न मानें। दृढ़ निश्चय और कठिन परिश्रम पर ही भरोसा करें। निश्चित सफलता मिलेगी। आइए जानते हैं भविष्य की राह दिखाने वाले इन मार्गदर्शकों ने संघर्ष करके कैसे सफलता हासिल की है-
इन खास लोगों से सीखें संघर्षों में तपकर कुंदन बनने का तरीका, अनोखा है इनकी सफलता का राज
बचपन में उठ गया पिता का साया हटा
गोरखपुर परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक राजेश डी मोडक ने बचपन से ही चुनौतियों का सामना किया है। मूलरूप से नागपुर, महाराष्ट्र के रहने वाले राजेश डी मोडक जब पांच वर्ष के थे तब ही पिता की एक दुर्घटना में निधन हो गया। इसके बाद तो हर तरफ संघर्ष ही था, लेकिन उनकी मां डॉ. इंदु रानी प्रसाद ने हौसला नहीं हारा। मां ने मृतक आश्रित में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी स्वीकार नहीं की। स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर क्लर्क बनीं। यह वह समय था, जब राजेश और उनके बड़े भाई अभीम मोडक ने तालीम शुरू की थी। सुख-सुविधाओं में कटौती कर मां ने पढ़ाई पूरी कराई। बकौल राजेश, मां ने पढ़ाई के प्रति हम लोगों में चिंगारी पैदा की। पढ़ाई के दौरान मैंने, बड़े भाई से पूछा कि टाइप करना सीख लूं, तो उन्होंने कहा कि कुछ ऐसा बनो कि टाइप करने वाला तुम्हारे पास हो। कुएं के मेंढक मत बनो, बाहर की दुनिया देखो। तुम पढ़ने में सबसे तेज हो। उनकी प्रेरणा से ही आज इस मुकाम पर हूं। इसलिए विद्यार्थियों को सलाह देता हूं और कहता हूं कि कुछ ऐसा करो कि लोगों में यह विश्वास पैदा हो जाए कि तुम में भी कुछ है।
कुछ ऐसी भी लड़ाई होती है, जहां हार भी जीत होती
चौथे प्रयास में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले आईएएस व सीडीओ इंद्रजीत सिंह को कारगिल में शहीद लखनऊ के परमवीर चक्र विजेता मनोज पांडेय की एक बात प्रेरित करती है। वह यह कि कुछ ऐसी लड़ाई होती है, जहां हार भी जीत होती है। वह कहते हैं कि पढ़ाई कभी बेकार नहीं जाती है। सफलता-असफलता अपनी जगह, मगर जब भी हम किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं, तो हमारा ज्ञान बढ़ता है। हम बहुत कुछ सीखते हैं, जो हर सेक्टर में काम आता है। जालंधर यूनिवर्सिटी के टॉपर इंद्रजीत सिंह जब वर्ष 2012 में मैसूर में पीएफ कमिश्नर पद पर तैनात हुए तभी ठान लिया था कि सफर यहीं नहीं रुकेगा। इंद्रजीत ने कभी नहीं सोचा था कि वह आईएएस बनेंगे। उनके परिवार के ज्यादातर सदस्य सेना में हैं। पिता एयरफोर्स से रिटायर हुए, जबकि बहन एयरफोर्स में हैं। भाई भी आर्मी में हैं। तीन बार परीक्षा दी, लेकिन सफलता चौथे प्रयास में मिल सकी। जब सेलेक्शन नहीं हुआ, तो निराशा को पनपने नहीं दिया। यही ताकत रही। आईएएस इंद्रजीत सिंह कहते हैं कि जिंदगी की यात्रा बहुत खूबसूरत है। हर दिन कुछ नया पाने की चाह है, तो बस बेहतर से बेहतर करने का संकल्प होना चाहिए। शिक्षक रहते हुए यदि, आप पढ़ते हैं तो बेहतर शिक्षक बनेंगे। डॉक्टर रहते हुए पढ़ते हैं, तो बेहतर डॉक्टर बनेंगे। बिना तनाव के पढ़ाई में सिर्फ सर्वश्रेष्ठ करने का संकल्प लें। सफलता कदम चूमेगी।
मां बनीं मार्गदर्शक, हौसला बढ़ाया और दिशा दी
खजनी की ज्वाइंट मजिस्ट्रेट व एसडीएम अनुज मलिक ने पहली बार में भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर ली। इसके लिए अनुज ने कड़ी मेहनत की। मां राजेश देवी ने मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। हौसला तो बढ़ाया ही, दिशा भी दी। बकौल, अनुज वर्ष 2015 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। दिल्ली में एक साल घर पर रहकर तैयारी की। कठिन परिश्रम किया। लिहाजा, पहले ही प्रयास में चयन हो गया। तैयारी के समय विषय का चयन कड़ी चुनौती थी। मनोविज्ञान चुना तो सहपाठियों ने एतराज जताया। अनुज ने बताया कि मैं भी असमंजस में पड़ गई, क्योंकि मनोविज्ञान विषय से चयन कम होता है। मां ने जब सुना तो बोलीं, पहली बार परीक्षा देने जा रही हो, फिर किस बात का डर। अगर तुम्हारी रुचि इसमें है, तो विषय मत बदलो। मैंने कड़ी मेहनत की और सफल रही। परीक्षार्थियों से कहूंगी की अपने पर भरोसा रखकर तैयारी करें। सफलता जरूर मिलेगी। यही हमारे सफलता का मंत्र भी है। अब आईएएस हूं। आपको मार्गदर्शन दे रही हूं। आपको बताएं, अनुज के पति गौरव सिंह सोगरवाल भी आईएएस हैं। वह इस समय महाराजगंज के सीडीओ हैं।
साक्षात्कार में छंटने पर भी नहीं छोड़ा हौसला
सीओ कैंपियरगंज व आईपीएस राहुल भाटी ने अपनी मंजिल बहुत मुश्किलों से पाई है। मूलरूप से नागौर, राजस्थान के रहने वाले राहुल भाटी ने वर्ष 2013 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद दिल्ली में जूनियर इंजीनियर पद पर नौकरी शुरू कर दी, लेकिन उन्हें सिविल सर्विसेज में जाना था। लगातार प्रयास के बाद 2016 में मिनिस्ट्री ऑफ पावर में नौकरी मिली। इससे आर्थिक समस्या दूर हो गई। बकौल राहुल, नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखी। कोचिंग करके आगे बढ़ने का संकल्प लिया। 2016 में सेलेक्शन हुआ, लेकिन साक्षात्कार में नहीं क्लीयर कर सके। इसके बावजूद हौसला नहीं छोड़ा। नौकरी के चलते तैयारी के लिए समय भी कम मिलता था, पर जितना पढ़ा, ईमानदारी से। अगले साल यानी 2017 में ही चयन हो गया। इस वर्ष फारेस्ट सर्विसेज में भी नौकरी मिली, लेकिन पसंद के हिसाब से पुलिस की नौकरी को चुना हैं। राहुल कहते हैं- अक्सर हिंदी माध्यम के विद्यार्थी डरे होते हैं कि उनका चयन कैसे होगा? उनसे इतना ही कहूंगा, माध्यम से कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं भी हिंदी माध्यम का छात्र रहा हूं। 12 वीं तक की पढ़ाई हिंदी माध्यम की रही है। बस, लक्ष्य साधकर मेहनत करें और धैर्य बनाए रखें। कामयाबी कदम चूमेगी।