कोरोना महामारी को लेकर पूरी दुनिया में हाहाकार मचा हुआ है, लेकिन बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि 118 वर्ष पूर्व 1902 में जब पूरा विश्व प्लेग महामारी के संक्रमण से जूझ रहा था तब रेलवे के अफसरों ने गोरखपुर में एक अलग बाजार खोला था। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें इसकी कहानी...
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रेलवे का सीनियर इंस्टीट्यूट।
- फोटो : अमर उजाला।
इसका मकसद था कि रेलकर्मी और सिविल लाइंस के लोग, गांवों और दूसरों इलाकों से आए नागरिकों के संपर्क में न आएं और संक्रमण से बच सकें। इसे देहरादून के बाजार की तर्ज पर खोला गया। जहां यह बाजार था, आज उस जगह पर रेलवे का सीनियर इंस्टीट्यूट मौजूद है।
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पहले ऐसा दिखता था गोरखपुर रेलवे स्टेशन।
- फोटो : अमर उजाला
पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबंधक कार्यालय में मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक इस बाजार को खोलने के लिए मिसेज कैंपियर ने होम बोर्ड लंदन को प्रस्ताव भेजकर पांच हजार रुपये के फंड की मांग की थी। जिसे स्वीकार कर लिया गया था। मिसेज कैंपियर, तत्कालीन रेलवे अफसर मिस्टर कैंपियर की पत्नी थीं।
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कैम्पियर गंज।
- फोटो : अमर उजाला।
मिस्टर कैंपियर के नाम पर ही कैंपियरगंज रेलवे स्टेशन का नाम भी रखा गया। रेलवे के अलग बाजार में जरूरत के हर सामान को कम मूल्य पर उपलब्ध कराया गया। साथ ही रेलवे के सभी अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि वे यह सुनिश्चित करें कि सभी रेलकर्मी और सिविल लाइंस में रहने वाले लोग यहां से सामान खरीदें। अगर शहर के बाजार से सामान खरीदना है तो उन्हें वैध कारण बताना था। जिसके बाद अनुमति दी जाती थी।
1908 में बाजार को दोबारा खोला गया
वर्ष 1908 में छोटी चेचक का संक्रमण भारत में बहुत तेजी से फैला तब तत्कालीन सीएमओ की पहल पर रेलवे अफसरों ने इस बाजार को दोबारा खोला था। चार जनवरी 1911 में इस बाजार को पूरी तरह बंद किया गया।