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लॉकडाउन: मोर्चरी में शव, गांव में एक साल के बेटे ने किया पिता के पुतले का अंतिम संस्कार

Tue, 21 Apr 2020 10:19 PM IST
शाहरुख खान राकेश त्रिपाठी, अमर उजाला, गोरखपुर
राकेश त्रिपाठी, अमर उजाला, गोरखपुर Published by: शाहरुख खान Updated Tue, 21 Apr 2020 10:19 PM IST
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corona virus in up One year old son cremated father paper effigy in gorakhpur
मृतक की पत्नी - फोटो : अमर उजाला

लॉकडाउन की वजह से परिवार के कमाऊ सदस्य की अर्थी को कंधा न दे पाने के चलते पुतले का दाह संस्कार करने वाला गोरखपुर जिले के चौरीचौरा के डुमरी खुर्द का परिवार एक अरसे से बदनसीबी की मार झेल रहा है। इस परिवार के पास मकान के नाम पर झोपड़ी है। हद तो यह है कि कोई सरकारी सुविधा भी मयस्सर नहीं है। 

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जबकि शासन गरीबों के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन ये योजनाएं सुनील के परिवार तक क्यों नहीं पहुंची, यह सोचने वाली बात है। इसे गांव के प्रधान चंद्रशेखर सिंह की लापरवाही कहें या कुछ और लेकिन पीड़ित परिवार के सामने इस समय रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है।
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दिल्ली में मजदूरी करता था सुनील
घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए ही सुनील (37 वर्ष) दिल्ली गए थे, लेकिन फिर कभी घर लौट नहीं सके। घर में उनकी पत्नी, चार बेटियां और एक बेटा हैं, जिनके सामने अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। यहां तक की जमीन भी नहीं है, जहां वे लोग खेती कर अपना पेट भर सकें। सुनील के दो भाई हैं, लेकिन वह अलग रहते हैं। जबकि माता कमला देवी परिवार से अलग रहती हैं।
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चिकन पॉक्स से दिल्ली में हो गई थी मौत
चौरीचौरा के डुमरी खुर्द निवासी सुनील दिल्ली के भारत नगर स्थित प्रताप बाग इलाके में किराए के मकान में रहते थे। वह यही मजदूरी करते थे। परिवार में पत्नी पूनम, चार बेटियां और एक साल का बेटा है। सुनील की बड़ी बेटी 10 साल की है। गांव में उसकी कोई जमीन नहीं है और परिवार झोपड़ी में रहता है। 

लॉकडाउन की वजह से सुनील दिल्ली में ही फंस गया। इस बीच उसे चेचक हो गया। 11 अप्रैल को तबीयत बिगड़ी तो स्थानीय लोगों की सूचना पर पुलिस ने उसे बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में भर्ती करा दिया, जहां से उसे अलग-अलग तीन अस्पताल में रेफर किया गया। 

सफदरजंग अस्पताल में 14 अप्रैल को सुनील की मौत हो गई। उसकी कोरोना रिपोर्ट भी निगेटिव आई। इधर, परिवार सुनील को फोन करता रहा, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुई। क्योंकि वह अस्पताल में जिंदगी-मौत से लड़ रहा था और मोबाइल उसके कमरे पर था। 

लगातार फोन आने की वजह से मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई। पुलिस ने मोबाइल को चार्ज किया। इस बीच उसके घर से कॉल आई तो पुलिस ने सुनील की पत्नी को उसकी मौत की खबर दी। आग्रह किया कि वह शव को दिल्ली आकर ले जाए। 

यह सुनते ही पूनम बिलख उठी। पूनम के पास पति की लाश ले जाने के लिए पैसे नहीं थे, ऊपर से लॉकडाउन। पत्नी ने ग्राम प्रधान व अन्य लोगों से मदद मांगी, लेकिन मायूसी हाथ लगी। बेबस होकर पूनम ने पति की जगह उसके पुतले का गांव में अंतिम संस्कार कर दिया। 
 

इसके साथ तहसीलदार से दिल्ली पुलिस को मैसेज भिजवा दिया कि पुलिस उसके पति का अंतिम संस्कार दिल्ली में ही कर दे और हो सके तो अस्थियां पीड़ितों के गांव भेज दी जाए। अब दिल्ली पुलिस भी पशोपेश में है। फिलहाल सुनील के शव का अंतिम संस्कार नहीं हो पाया है।

क्या बोले ग्राम प्रधान
गांव के प्रधान चंद्रशेखर सिंह ने बताया कि पीड़ित परिवार कभी भी उनके पास मदद मांगने के लिए नहीं आया था। इसलिए वह मदद नहीं कर पाए। सरकारी सुविधाएं न मिलने के सवाल पर ग्राम प्रधान ने चुप्पी साध ली।

सांसद ने बढ़ाया मदद का हाथ
अमर उजाला में 21 अप्रैल को प्रकाशित खबर का संज्ञान लेते हुए बांसगांव के सांसद कमलेश पासवान ने मंगलवार को पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद की। उन्होंने अपने सहयोगियों के माध्यम से पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद भिजवायी। साथ ही राशन आदि का प्रबंध कराया।

एसडीएम ने की आर्थिक मदद
चौरीचौरा के एसडीएम अर्पित गुप्ता मंगलवार को सुनील के घर पहुंचे और पीड़ित परिवार को सांत्वना देने के साथ ही। 50 हजार रुपये की आर्थिक मदद की। उन्होंने सुनील के बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी ली। कहा कि बच्चों की स्कूल की फीस और अन्य खर्च वह खुद वहन करेंगे। इसके अलावा कुछ लोग भी मदद को आगे आए हैं।
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