मां दुर्गा की उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्रि शनिवार से शुरू हो रहा है। शहर में नवरात्र की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। प्रमुख देवी मंदिरों को सजाया जा चुका है। चुनरी, नारियल आदि पूजन सामग्री की दुकानें सज कर तैयार हैं। शनिवार को भक्त माता के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना कर मंगलकामना करेंगे। वहीं कोविड-19 की गाइडलाइन को ध्यान में रखते हुए मंदिर, पंडालों और घरों में शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना की जाएगी।
Navratri 2020: आज से शुरू हुई शारदीय नवरात्रि, जानिए कलश स्थापना का मुहूर्त
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कलश स्थापना का मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार इस वर्ष वैधृति योग तो नहीं लेकिन चित्रा नक्षत्र दिन में दो बजकर 22 मिनट तक है। सुबह सात बजकर 38 मिनट से नौ बजकर चार मिनट तक शुभ, दोपहर एक बजकर 23 मिनट से दो बजकर 29 मिनट लाभ एवं दो बजकर 49 मिनट से चार बजकर 15 मिनट तक अमृत बेला में कलश स्थापना कर सकते हैं। इसके साथ ही अभिजीत मुहूर्त दिन में 11 बजकर 38 मिनट से 12 बजकर 23 मिनट तक है।
दो दिन मनेगी दशमी
भारतीय विद्वत समिति के महामंत्री डॉ. जोखन पांडेय ने बताया कि शारदीय नवरात्रि का आरंभ 17 अक्तूबर से हो रहा है। 17 अक्तूबर को ही नवरात्र का शुभारंभ, कलश स्थापना के साथ प्रारंभ होकर 25 अक्तूबर दिन रविवार तक चलेगा। नौ दिनों का व्रत रखने वाले श्रद्धालु 26 अक्तूबर को सुबह 11 बजकर 33 मिनट के पूर्व पारण करेंगे। दुर्गाष्टमी का व्रत 24 अक्तूबर को किया जाएगा। विजयादशमी का पर्व 25 अक्तूबर को सुबह 11 बजकर 14 मिनट के बाद परंपरागत अनुष्ठानों के साथ संपन्न होगा। नवमी तिथि 24 अक्तूबर को दिन में 11 बजकर 27 मिनट से प्रारंभ होकर 25 अक्तूबर को सुबह 11 बजकर 14 मिनट तक है। अत: नवरात्र व्रत की पूर्णाहुति इसी के बाद होगी। 25 और 26 दोनों दिन दशमी होने के कारण दोनों ही दिन दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन होगा।
ऐसे करें पूजन-अर्चन
पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार नवरात्रि का पर्व आरंभ करने के लिए मिट्टी की वेदी बनाकर उसमें जौ और गेंहू मिलाकर बोएं। उस पर विधि पूर्वक कलश स्थापित करें। कलश पर देवी जी मूर्ति (धातु या मिट्टी) अथवा चित्रपट स्थापित करें। नित्यकर्म समाप्त कर पूजा सामग्री एकत्रित कर पवित्र आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें तथा आचमन, प्राणायाम, आसन शुद्धि करके शांति मंत्र का पाठ कर संकल्प करें। रक्षादीपक जला लें। सर्वप्रथम क्रमश: गणेश-अंबिका, कलश (वरुण), मातृका पूजन, नवग्रहों तथा लेखपालों का पूजन करें। प्रधान देवता-महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती-स्वरूपिणी भगवती दुर्गा का प्रतिष्ठापूर्वक ध्यान, आह्वान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, गन्ध, अक्षत, पुष्प, पत्र, सौभाग्य द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, ऋतुफल, ताम्बूल, निराजन, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, नमस्कार, प्रार्थना, समापन-आदि षोडश उपचारों से विधिपूर्वक श्रद्धा भाव से एकाग्रचित होकर पूजन करें।
आज मां शैलपुत्री की होगी आराधना
पंडित राकेश पांडेय के अनुसार प्रतिपदा तिथि के दिन मां शैलपुत्री की आराधना करें। मां दुर्गा अपने पहले स्वरूप में मां शैलपुत्री के नाम से जानी जातीं हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था। वृषभ स्थिता इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल व बाएं हाथ में कमल का पुष्प सुशोभित है। यही मां नवदुर्गा का प्रथम स्वरूप है।