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यूपी: इस पार्क की दीवारें बयां कर रही हैं महंत दिग्विजयनाथ की कहानी, तस्वीरों में देखें एक झलक

Wed, 22 Sep 2021 04:36 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Wed, 22 Sep 2021 04:36 PM IST
सार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान मौजूद रहेंगे। ब्रह्मलीन महंत ने किराए के कमरे में शिक्षा की ज्योति जलाई थी। आज विश्वविद्यालय तक का उसका विस्तार हो गया है।

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Mahant Digvijaynath special story on 52nd death anniversary
दिग्विजयनाथ पार्क बनकर तैयार। - फोटो : अमर उजाला।

सन् 1935 से 1969 तक नाथपंथ के विश्व विख्यात गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर रहे ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 52वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में गोरखनाथ मंदिर में साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह जारी है। प्रतिदिन राष्ट्र व समाजहित में समाज के मार्गदर्शक संतों व राष्ट्रीय स्तर के विषय विशेषज्ञों के मंथन सार से लोग रूबरू हो रहे हैं। रामगढ़ताल के समीप बने स्मृति पार्क में स्थापित महंत दिग्विजयनाथ की साढ़े बारह फीट ऊंची प्रतिमा लोगों को प्रेरित करेगी। इस प्रतिमा का अनावरण मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान करेंगे। ब्रह्मलीन महंत के नाम को समर्पित इस पार्क में प्रतिमा अनावरण से पहले दीवारों पर उकेरी गई म्यूरल पेंटिंग उनके जीवन यात्रा का दर्शन कराने वाली है।



महंत दिग्विजयनाथ का जन्म वर्ष 1894 में वैशाख पूर्णिमा के दिन चित्तौड़, मेवाड़ ठिकाना ककरहवां (राजस्थान) में हुआ था। उनके बचपन का नाम नान्हू सिंह था। पांच वर्ष की उम्र में 1899 में इनका आगमन गोरखपुर के नाथपीठ में हुआ। अपनी जन्मभूमि मेवाड़ की माटी की तासीर थी कि बचपन से ही उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति और स्वाभिमान से समझौता न करने की प्रवृत्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी। उनकी शिक्षा गोरखपुर में ही हुई और उन्हें खेलों से भी गहरा लगाव था। 15 अगस्त 1933 को गोरखनाथ मंदिर में उनकी योग दीक्षा हुई और 15 अगस्त 1935 को वह इस पीठ के पीठाधीश्वर बने।

 

Mahant Digvijaynath special story on 52nd death anniversary
दिग्विजयनाथ पार्क बनकर तैयार। - फोटो : अमर उजाला।

वह आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेते रहे। देश को स्वतंत्र देखने का उनका जुनून था कि उन्होंने 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के समर्थन में स्कूल छोड़ दिया। उन पर लगातार आरोप लगते थे कि वह क्रांतिकारियों को संरक्षण और सहयोग देते हैं। 1922 के चौरीचौरा के घटनाक्रम में भी उनका नाम आया लेकिन उनकी बुद्धिमत्ता के सामने ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा और उन्हें रिहा कर दिया गया।

 

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दिग्विजयनाथ पार्क बनकर तैयार। - फोटो : अमर उजाला।

श्रीराम मंदिर आंदोलन में नींव के पत्थर हैं महंत
अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर के निर्माण को लेकर हुए आंदोलनों में गोरक्षपीठ की महती भूमिका से सभी वाकिफ हैं। ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ इस आंदोलन में नींव के पत्थर हैं। 1934 से 1949 तक उन्होंने लगातार अभियान चलाकर आंदोलन को न केवल नई ऊंचाई दी बल्कि 1949 में वह श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के नेतृत्वकर्ता भी रहे। पांच सौ वर्षों के इंतजार के बाद 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। ऐसे में जब भी मंदिर का जिक्र होगा, ब्रह्मलीन महंतश्री आप ही स्मरित होंगे।

 

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Mahant Digvijaynath special story on 52nd death anniversary
दिग्विजयनाथ पार्क बनकर तैयार। - फोटो : अमर उजाला।

शिक्षा की जलाई ज्योति से प्रकाशित हो रहा अंचल
महंत दिग्विजयनाथ ने गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों के लिए शिक्षा की जो ज्योति जलाई, उससे आज पूरा अंचल प्रकाशित हो रहा है। शिक्षा क्रांति के लिए उन्होंने 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। एक किराए के मकान में परिषद के अंतर्गत महाराणा प्रताप क्षत्रिय स्कूल शुरू हुआ। 1935 में इसे जूनियर हाईस्कूल की मान्यता मिली और 1936 में हाईस्कूल की भी पढाई शुरू हुई। नाम 'महाराणा प्रताप हाईस्कूल' हो गया।

 

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दिग्विजयनाथ पार्क बनकर तैयार। - फोटो : अमर उजाला।

इसी बीच महंत दिग्विजयनाथ के प्रयास से गोरखपुर के सिविल लाइंस में पांच एकड़ भूमि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को प्राप्त हो गई और महाराणा प्रताप हाईस्कूल का केंद्र सिविल लाइंस हो गया तथा देश के आजाद होते समय यह विद्यालय महाराणा प्रताप इंटरमीडिएट कॉलेज के रुप में प्रतिष्ठित हुआ। 1949-50 में इसी परिसर में महाराणा प्रताप डिग्री कॉलेज की स्थापना महंत की अगुवाई में हुई। शिक्षा को लेकर उनकी सोच दूरदर्शी और निजी हित से परे थी।

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