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मां सीता के केश से बनी है ये चीज, ग्रहण के दुष्प्रभावों से दिलाती है मुक्ति, जानिए कैसे
ग्रहण के दौरान निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए मंदिरों से लेकर घरों तक हर वस्तु की शुद्धि के लिए तमाम साधन उपयोग में लाए जाते हैं। इन्हीं साधनों में सबसे अहम है कुश का प्रयोग। आइए हम आपको इससे जुड़ी एक रोचक कहानी बताते हैं।
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kusha grass
- फोटो : अमर उजाला।
मान्यता है कि जब सीता माता पृथ्वी में समाई थीं तो भगवान राम जल्दी से दौड़कर उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु उनके हाथ में केवल सीता माता का केश ही आ पाया। ये केश राशि ही कुश के रूप में परिवर्तित हो गई। ग्रहण काल में हर वस्तु में कुश डालने की मान्यता है। कुश का महत्व सनातन धर्म के साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत अधिक है।
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ज्योतिष पं. शरद चंद्र मिश्र।
- फोटो : अमर उजाला
पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि कुश ऊर्जा का कुचालक है। इसीलिए सूर्य व चंद्रग्रहण के समय इसे भोजन और पानी में डाल दिया जाता है जिससे ग्रहण के समय पृथ्वी पर आने वाली किरणें कुश से टकराकर परिवर्तित हो जाती हैं।
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kusha grass
- फोटो : अमर उजाला।
भोजन और पानी पर उन किरणों का विपरीत असर नहीं पड़ता। इस दौरान व्यक्ति को कुश का तिनका अपने शरीर से स्पर्श करते हुए भी रखना चाहिए। पुरुष अपने कान के ऊपर कुश का तिनका लगा सकते हैं, वहीं महिलाएं अपनी चोटी में इसे धारण करके रखें।
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ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय।
- फोटो : अमर उजाला
पंडित नरेंद्र उपाध्याय ने बताया कि कुश से बने आसन पर बैठ कर साधना करने से आरोग्य, यश और तेज की वृद्धि होती है। साधक की एकाग्रता भंग नहीं होती। कुश मूल की माला से जाप करने से अंगुलियों के एक्यूप्रेशर बिंदु दबते रहते हैं, जिससे शरीर में रक्त संचार ठीक रहता है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को लाई गई कुशावर्ष भर तक पवित्र रहती है। देव पूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत, ग्रहशांति पूजन कार्यो में रुद्र कलश एवं वरुण कलश में जल भर कर सर्वप्रथम कुश डालते हैं। कलश में कुश डालने का वैज्ञानिक पक्ष यह है कि कलश में भरा हुआ जल लंबे समय तक जीवाणु से मुक्त रहता है।
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