उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में एक ऐसा परिवार है, जो खुशी के हर मौके जैसे जन्मदिन, सालगिरह, बच्चे के जन्म, नए काम की शुरूआत आदि का जश्न घर में पौधा लगाकर मनाता है। यह परिवार है गोल्डन गैस एजेंसी के संचालक विवेक तुली का। उनकी पत्नी मोहिनी तुली घर संभालने के साथ ही अपने गार्डेनिंग के शौक को भी बखूबी पूरा कर रही हैं।
तस्वीरें: गोरखपुर की 'मोहिनी' का यह खास शौक बन गया जुनून, अब पूरा परिवार खुशी के हर मौके पर ऐसे मनाता है जश्न
मोहिनी तुली ने अपने रुस्तमपुर स्थित आवास पर 13 हजार स्क्वायर फीट में गार्डन तैयार किया है। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने बताया कि वाराणसी में अपने माता-पिता के साथ रहने के दौरान ही उन्हें फूल और पौधों से लगाव हो गया था। वर्ष 1995 में शादी के बाद जब ससुराल आई तो यहां खाली जमीन देखकर गार्डेनिंग के शौक को पूरा करने की लालसा जगी। सास उर्मिला तुली का मार्गदर्शन मिला तो यह शौक धीरे-धीरे जुनून बन गया। अब वह इस काम में इतनी पारंगत हो चुकी हैं कि जैविक खाद से लेकर जैविक कीटनाशक तक खुद घर में ही तैयार करती हैं।
हर बच्चे के नाम से लगाए ताड़ के पौधे
घर में जन्म लेने वाले हर बच्चे के नाम पर परिवार की ओर से एक ताड़ का पौधा गार्डेन में लगाया जाता है। गार्डन में आम, चीकू, नींबू, पपीता, अमरूद, अनार की कई प्रजातियों के पेड़-पौधे मौजूद हैं। पूरे घर के अंदर 500 गमलों का एक से बढ़कर एक कलेक्शन है, जिसमें चाइनीज पॉम, पांच रंगों के गुलाब, चंपा, बैंबो, साइकस, पुदीना, तुलसी समेत 1000 पेड़-पौधे, फूल और कैक्टस मौजूद हैं।
प्याज के छिलके से कीटनाशक करतीं हैं तैयार
मोहिनी तुली ने बताया कि पौधों की सुरक्षा के लिए कीटनाशक का छिड़काव जरूरी होता है। इसके लिए वह प्याज के छिलके, नीम की पत्तियों को उबाल कर कीटनाशक तैयार करती हैं। इसके साथ ही केले के छिलके, पेड़ की पत्तियों, सब्जियों और फल के वेस्ट से खाद को घर पर ही तैयार करती हैं। मोहिनी तुली ने पौधे से पौधा तैयार करने का गुर भी सीखा है। इस विधा का इस्तेमाल वह अपने गार्डन के पौधों को विकसित करने के लिए करती हैं।
‘हरियाली के लिए समय निकालना जरूरी’
मोहिनी तुली का कहना है कि भागदौड़ भरी जिंदगी में कुछ समय हरियाली को बनाए रखने के लिए निकाला जाना जरूरी है। सारी सुख-सुविधाएं, रुपये-पैसे पास रहकर क्या होगा, जब साफ हवा के लिए तरसना पड़े। हरियाली मन को सुकून देती है। पौधे भी आपसे बातें करते हैं। जिसे इनसे लगाव हो गया, उन्हें पर्यावरण संरक्षण के प्रति सचेत करने की जरूरत नहीं पड़ती।