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अमर उजाला संवाद: निर्भया पर बोलीं बेटियां, कानून ही नहीं खुद की सोच भी बदलने की जरूरत

Wed, 19 Feb 2020 08:31 PM IST
vivek shukla डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर।
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Wed, 19 Feb 2020 08:31 PM IST
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aprajita 100 million smiles student demand for now Nirbhaya convicts to be hanged in Gorakhpur
निर्भया संवाद में हिस्सा लेती छात्राएं। - फोटो : राजेश कुमार
जघन्य अपराध के मामले में कानून सख्त होने चाहिए। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि फैसले तत्काल हों। बेशक आरोपियों को बचाव का मौका दें लेकिन कानून में संशोधन ऐसा हो कि अदालती दांव-पेंच में फैसले को लटकाने वाले पैंतरे इस्तेमाल नहीं हो सकें। साथ ही समाज में भी महिलाओं के प्रति मानसिकता बदलने की जरूरत है। यह बदलाव खुद से ही होगा, इसमें माता-पिता की भूमिका अहम है कि वे बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करें।

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निर्भया संवाद में हिस्सा लेती छात्राएं। - फोटो : राजेश कुमार
यह विचार गोरखपुर विश्वविद्यालय एवं शैक्षणिक संस्थानों से आईं छात्राओं ने व्यक्त किए। वे बुधवार को अमर उजाला के सिटी कार्यालय में ‘निर्भया केस’ के संदर्भ में महिला हिंसा के दोषियों को सजा में हो रही देरी पर आयोजित विमर्श का हिस्सा थीं। गरिमा शुक्ला, अमृत कौर एवं अंकिता यादव ने कहा कि रेप जैसे जघन्य अपराध में सिर्फ फांसी की सजा होनी चाहिए। कानून भी ऐसा हो कि फैसले में ज्यादा वक्त न लगे।
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निर्भया संवाद में हिस्सा लेती छात्राएं। - फोटो : राजेश कुमार

अंचल शुक्ला, मनीषा यादव व अर्पिता का तर्क था कि हम जितना भी कानून सख्त बना लें जब तक सोच नहीं बदलेगी, कुछ भी नहीं होने वाला है। वे बेबाकी से कहती हैं कि अपराध का जन्म तो घर से ही होता है। कपड़े देखकर लड़कियों के चरित्र का अनुमान लगाने वाली सोच को बदलने की जरूरत है। इस बदलाव में सभी को योगदान देना होगा तभी महिलाओं के प्रति पुरुषों में अच्छी सोच विकसित होगी।

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निर्भया संवाद में हिस्सा लेती छात्राएं। - फोटो : राजेश कुमार
हालांकि सुष्मिता सिंह, पूजा शर्मा और बाबी शर्मा की सोच थोड़ी अलग रही। वे कहती हैं कि महिलाओं में प्रतिरोध की क्षमता विकसित होनी चाहिए। अगर कोई हमें घूर के देख रहा है या अभद्र टिप्पणी करता है तो तत्काल उसका विरोध करें। प्रियांशी श्रीवास्तव, प्रिया यादव एवं सुफरीन खातून मानती हैं कि ‘निर्भया कांड’ में यह सामने आ गया है कि हमारा कानून कितना लचीला है।

इसी का फायदा उठाकर दोषी बचने की कोशिश कर रहे हैं और डेथ वारंट जारी होने के बाद भी फांसी टल गई। अब तीन मार्च को फांसी होनी है लेकिन दोषी कानूनी दांव-पेच खेलने में लगे हैं। वहीं, प्रतिमा कुमारी एवं सोनम गुप्ता का कहना है कि तत्काल फैसले वाला कानून तो बनना ही चाहिए, बेटा-बेटी में समानता का भाव जरूरी है। घर आधार होता है, यह कार्य परिवार से ही शुरू हो पाएगा। कानून तो बदले ही हम भी बदलें तभी समाज से महिलाओं के प्रति गलत सोच खत्म होगी।
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निर्भया संवाद में हिस्सा लेती छात्राएं। - फोटो : राजेश कुमार
खुशनामा खातून कहती हैं कि निर्भया कांड में कानून के लचीलेपन का फायदा दोषियों ने उठाया है। जघन्य अपराध के मामले में कानून ज्यादा सख्त होने चाहिए। अदालत के फैसले भी जल्द होने चाहिए ताकि दोषी को सजा देने में देरी न हो। इससे समाज में बड़ा संदेश जाएगा।

दनिष्टा अंजुम ने कहा कि निर्भया कांड जैसे मामलों में कानून में बदलाव की जगह लोगों की सोच और मानसिकता बदलने की जरूरत है। लड़कों में भी बचपन से ही अच्छे संस्कार देने होंगे और इसमें माता-पिता की बड़ी भूमिका रहेगी।
 
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