दिल की डायरी: पटना से देहरादून होते हुए इसलिए मुंबई पहुंचे राजेश कुमार, पहले शॉट में लेने पड़े 14 रीटेक
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अमर उजाला डिजिटल के पाठकों के लिए हम एक नई सीरीज 'दिल की डायरी' शुरू कर रहे हैं। इस सीरीज में सिनेमा, टीवी और ओटीटी के चर्चित कलाकार अपने प्रशंसकों के साथ अपनी वे यादें साझा करेंगे, जिनके बारे में उनके चाहने वाले हमेशा जानना चाहते रहे हैं। चूंकि मामला दिल की डायरी का है, सो ये सारी बातें ये कलाकार खुद अपने शब्दों में ही बताएंगे। तो शुरूआत करते हैं, टेलीविजन के चर्चित कलाकार, राजेश कुमार की 'दिल की डायरी' से।
पटना से पहुंचे देहरादून
'मेरा बचपन अलग-अलग जगहों पर बीता और सब कुछ इत्तेफाकन होता रहा। कक्षा सात तक मैंने पटना और गया में पढ़ाई की। फिर उसके बाद मुझे देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया। वहां से फिर मुझे दिल्ली के हिंदू कॉलेज में दाखिला मिला और इत्तेफाकन ही मुंबई आना हुआ। इनमें कोई भी चीज जानबूझकर नहीं की गई। मैंने अपने स्कूल में पहला नाटक उस समय किया था जब मैं नर्सरी में था। उसकी तस्वीर आज भी मेरे घर में मौजूद है। पटना में मेरा घर है जहां मेरे माता-पिता अब भी रहते हैं। इसके बाद मैंने अपना दूसरा नाटक देहरादून में कक्षा 10 में किया और वहां से फिर नाटक करते रहे। ये नाटक सिर्फ स्कूल तक ही सीमित थे। जब मैं दिल्ली पहुंचा तो हिंदू कॉलेज में हमने नुक्कड़ नाटक और स्कूल में नाटक करना जारी रखा। मैं कभी किसी थिएटर ग्रुप या फिर एक्टिंग की किसी पेशेवर पढ़ाई में नहीं गया। यह सब मैं शौकिया तौर पर करता था। पढ़ाई में मेरा मन ज्यादा लगता नहीं था इसलिए, मैं नाटकों के जरिए अपना समय कुछ रचनात्मक चीजों में खर्च किया करता था। इस बीच अचानक से मुझे मुंबई आना पड़ा।'
मामा बनने पहुंचे मुंबई
'ये उन दिनों की बात है जब मुंबई में मेरी दीदी रहती थीं। वह गर्भवती थीं और वक्त जरूरत दवा लाने या उन्हें अस्पताल से ले जाने के लिए कोई दूसरा इस शहर आ नहीं सकता था सो मैं आ गया। मेरे मामा बनने में डॉक्टरो के हिसाब से अभी दो महीने बाकी थे तो दो महीने मैं क्या करूं ये सोच कर मैं कुछ अलग सा करने की योजना बनाने लगा।'
यूं शुरू हुआ अभिनय का सिलसिला
'एक दिन शाम के वक्त एक महाशय अनायास ही मुझसे टकरा गए। दरअसल, उनका नाटक मैंने दिल्ली में देखा था और वह बहुत अच्छे अभिनेता थे। आजकल वह 'जिनी और जूजू' और 'क्राइम पेट्रोल' के एक बड़े चेहरे हैं। उनका नाम है हर्ष खुराना। मैं गोरेगांव में रहता था और वह भी इसी मोहल्ले में थे। उसी समय मैंने उनको पहचान लिया और उनसे विनती की कि मुझे कहीं कुछ काम दिलाने में मदद करें। मैंने उनसे कहा कि मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं और उनके एक दोस्त का दोस्त हूं। उन्होंने ही मुझे बताया कि यहां अक्सर नाटक होते रहते हैं। तो जाइए, देखिए और काम करने का तरीका समझिए। उनके कहने पर मैं नाटक देखने गया। उस समय एक नाटक की रिहर्सल ही चल रही थीं। मुझे वह अच्छा लगा तो मैं हर रोज रिहर्सल देखने जाने लगा। एक दिन उस नाटक का एक कलाकार नहीं आया। लोगों की नजर मुझ पर थी कि ये रोज यहां आकर बैठा रहता है तो कुछ तो इसकी दिलचस्पी नाटकों में होगी ही। तो रिहर्सल के बीच में ही मुझे उस कलाकार के किरदार का प्रस्ताव मिल गया। उस नाटक के रिहर्सल कुछ सात से आठ महीने तक चले। इस बीच मैं मामा बन गया और इस नाटक के शोज भी होने लगे। फिर मैंने मैंने मुंबई में ही रुकने का मन बना लिया, ये अलग बात है कि मेरी दीदी और उनका परिवार वाले अमेरिका चले गए हैं।'
'फर्स्ट ब्रेक' की यादें
'इस नाटक को करते हुए ही मेरे कई दोस्त बने जिनकी वजह से मैं टेलीविजन अभिनेता बन गया। पहला ब्रेक मुझे स्टार प्लस के शो 'स्टार बेस्ट सेलर' में मिला। पहला संवाद जो मुझे कैमरे के सामने बोलना था, वह था, "हैप्पी एनिवर्सरी, कांग्रेचुलेशन! यह रही आपकी टिकट।" इसको करने में ही मैंने 14 टेक ले लिए। मेरा ये सीन राजेश्वरी सचदेवा और रजत कपूर के साथ थे जिन्हें देखकर मैं बहुत ज्यादा नर्वस हो रहा था। लेकिन धीरे धीरे मैं कैमरा समझने लगा और कैमरे की भी मुझसे दोस्ती हो ही गई। फिर 'साराभाई वर्सेस साराभाई' मिला और उसने मेरी जिंदगी बदल दी। वह दौर ऐसा था जब हम पेजर से लैंडलाइन और लैंडलाइन से मोबाइल तक का सफर तय कर रहे थे। सारे कलाकार तब ब्रेक के दौरान आपस में गप्पें ही मारा करते थे। शायद उन दिनों बने दोस्तों का रिश्ता आज भी इतना मजबूत है। अब आज तो ब्रेक मिलते ही सारे कलाकार तुरंत अपना मोबाइल निकाल लेते हैं और उसी में व्यस्त हो जाते हैं।'
मेहनत करे इंसान तो क्या काम है मुश्किल
'एक खास बात और मैं जो कहना चाहूंगा वो ये कि टीवी जगत में इन दिनों जो कलाकार 40 या उससे ऊपर के हैं, उनके पास आज भी सबसे ज्यादा काम है तो उसके पीछे इन सबकी लगातार मेहनत और रिश्तों की डोर थामे रहना है। रूपाली गांगुली, मानव गोहिल, हितेन तेजवानी, वरुण बडोला, सुचिता त्रिवेदी सब बढ़िया काम कर रहे हैं। अनुभव जीवन में हमेशा काम आता है, देखना ये है कि हमने अनुभवों को कितना जिया है।'
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