संजय गांधी को भले ही ही भारतीय जनमानस में एक अड़ियल और जिद्दी नेता के रूप में जाना जाता हो लेकिन उनके करीबी उनके बारे में कुछ ऐसी बातें बताई हैं जिनसे आम लोग बहुत कम वाकिफ हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे पुष्पेश पंत कहते हैं, 'कहीं न कहीं एक दिलेरी उस शख़्स में थी और कहीं न कहीं हिंदुस्तान की बेहतरी का सपना भी उनके अंदर था।'
बर्थडे स्पेशलः संजय गांधी के करीबियों ने उनके बारे में बताई 10 ऐसी बातें जिनसे अनजान हैं लोग
संजय की डेडलाइन एक दिन पहले की होती थी कुमकुम चड्ढा हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़ी हुई वरिष्ठ पत्रकार हैं और उन्होंने बहुत नज़दीक से संजय गाँधी को कवर किया है। कुमकुम चड्ढा बताती हैं, 'किस तरह से उन्होंने अपने लोगों से परिवार नियोजन को लेकर लक्ष्य पूरे करने के लिए कहा, ये मैं नहीं जानती, लेकिन इतना मुझे पता है कि उन्होंने ऐसा करने के लिए हर एक के लिए लक्ष्य निर्धारित किए थे। हर कोई चाहता था कि इस लक्ष्य को हर कीमत पर पूरा किया जाए।' वो कहती हैं, 'दूसरी तरफ़ संजय के पास जा कर कोई ये नहीं कह सकता था कि ये नहीं हुआ। वो लोग संजय से बहुत डरते थे। उनकी डेडलाइन हमेशा एक दिन पहले की हुआ करती थी। इसलिए संजय के निर्देश पर जो कुछ भी लोग कर रहे थे, वो बहुत जल्दबाज़ी में कर रहे थे, जिसकी वजह से उसके उलटे परिणाम आने शुरू हो गए।'
चाय भी नहीं पीते थे संजय गांधी आम लोगों के मन में संजय गांधी की छवि एक 'मैन ऑफ़ एक्शन' वाले शख़्स की है, जिसके पास धीरज की कमी थी। आम धारणा के ख़िलाफ़ वो शराब सिगरेट तो दूर, चाय पीना तक पसंद नहीं करते थे। गहलोत बताते हैं, 'वो कैंपा कोला और पेप्सी तक पीना पसंद नहीं करते थे और लोगों से सवाल पूछा करते थे कि तुम पान क्यों खाते हो। मैं समझता हूं कि देश को नौजवानों को वो अलग रास्ते पर ले जाना चाहते थे।'
मुंहफट और स्पष्टवादी संजय गांधी की आम छवि कम बोलने वाले मुंहफट शख़्स की थी। लेकिन एक ज़माने में संजय गांधी के क़रीबी और युवा कांग्रेस के नेता रहे जनार्दन सिंह गहलोत बताते हैं, 'उनमें रफ़नेस कतई नहीं थी। वो स्पष्टवादी ज़रूर थे जिसे सही मायने में आज तक भारतवासी स्वीकार नहीं कर पाए हैं। आज जो चापलूसों का ज़माना है, हर राजनीतिज्ञ मीठी बातें करता है, मैं समझता हूं, वो उससे हट कर थे। इसलिए उनकी छवि बनती रहती थी कि वो रूखे हैं, जो कि वो बिल्कुल नहीं थे।'
तेज रफ्तार में चलाते थे गाड़ी जनार्दन सिंह गहलोत कहते हैं, 'उनका एक शौक था कि वो गाड़ी बहुत तेज़ चलाते थे। एक बार हम, संजय गांधी और अंबिका सोनी तीनों पंजाब के टूर से आ रहे थे। उनकी आदत थी कि वो अपनी गाड़ी ख़ुद चलाते थे और हमारी ये हालत थी कि हमारे हाथ पैर फूल रहे थे कि कहीँ गाड़ी का एक्सीडेंट न हो जाए। जब हम उन्हें टोकते थे तो वो कहते थे, डरते हो क्या?' वो कहते हैं, 'जिस दिन वो प्लेन उड़ाने गए थे, मेनकाजी ने इंदिराजी से कहा था कि वो संजय से गोता न लगाने के लिए कहे और उन्हें रोक लें। लेकिन जब तक इंदिराजी बाहर पहुंचती, वो अपनी मैटाडोर ले कर निकल चुके थे। उसी दिन ये हादसा हो गया।'