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ओशोः जितनी रहस्यमयी जिंदगी, उतनी ही रहस्यमयी मौत, पढ़ें जन्म से मृत्यु तक के 6 बड़े राज

Sat, 19 Jan 2019 01:00 PM IST
shubham बीबीसी, नई दिल्ली
बीबीसी, नई दिल्ली Published by: shubham Updated Sat, 19 Jan 2019 01:00 PM IST
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Osho Death Anniversary his life and death both was mysterious know 6 interesting facts of his life
Osho

ओशो का जीवन जितना रहस्यमयी था, उतनी ही उनकी मौत भी। उनकी मृत्यु को 29 साल पूरे हो चुके हैं। साल 1990 में आज ही के दिन वो दुनिया छोड़ गए थे। इस मौके पर हमने उनकी विरासत, उनके जीवन के छुए-अनछुए पहलुओं पर रोशनी डालने की कोशिश की है।

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1. ओशो का शुरुआती जीवन
11 दिसंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा में उनका जन्म हुआ था। जन्म के वक्त उनका नाम चंद्रमोहन जैन था। बचपन से ही उन्हें दर्शन में रुचि पैदा हो गई। ऐसा उन्होंने अपनी किताब 'ग्लिम्पसेस ऑफ माई गोल्डन चाइल्डहुड' में लिखा है। उन्होंने अपनी पढ़ाई जबलपुर में पूरी की और बाद में वो जबलपुर यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के तौर पर काम करने लगे। उन्होंने अलग-अलग धर्म और विचारधारा पर देश भर में प्रवचन देना शुरू किया। प्रवचन के साथ ध्यान शिविर भी आयोजित करना शुरू कर दिया। शुरुआती दौर में उन्हें आचार्य रजनीश के तौर पर जाना जाता था। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने नवसंन्यास आंदोलन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने खुद को ओशो कहना शुरू कर दिया।

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2. अमरीका प्रवास
साल 1981 से 1985 के बीच वो अमरीका चले गए। अमरीकी प्रांत ओरेगॉन में उन्होंने आश्रम की स्थापना की। ये आश्रम 65 हजार एकड़ में फैला था। ओशो का अमरीका प्रवास बेहद विवादास्पद रहा। महंगी घड़ियां, रोल्स रॉयस कारें, डिजाइनर कपड़ों की वजह से वे हमेशा चर्चा में रहे। ओरेगॉन में ओशो के शिष्यों ने उनके आश्रम को रजनीशपुरम नाम से एक शहर के तौर पर रजिस्टर्ड कराना चाहा लेकिन स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। इसके बाद 1985 वे भारत वापस लौट आए।

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Osho Death Anniversary his life and death both was mysterious know 6 interesting facts of his life
osho - फोटो : अमर उजाला

3. ओशो की मृत्यु
भारत लौटने के बाद वे पुणे के कोरेगांव पार्क इलाके में स्थित अपने आश्रम में लौट आए। उनकी मृत्यु 19 जनवरी, 1990 में हो गई। उनकी मौत के बाद पुणे आश्रम का नियंत्रण ओशो के करीबी शिष्यों ने अपने हाथ में ले लिया। आश्रम की संपत्ति करोड़ों रुपये की मानी जाती है और इस बात को लेकर उनके शिष्यों के बीच विवाद भी है। ओशो के शिष्य रहे योगेश ठक्कर ने बीबीसी मराठी से कहा, "ओशो का साहित्य सबके लिए उपलब्ध होना चाहिए। इसलिए मैंने उनकी वसीयत को बॉम्बे हाई कोर्ट में चैलेंज किया है।" ओशो का डेथ सर्टिफिकेट जारी करने वाले डॉक्टर गोकुल गोकाणी लंबे समय तक उनकी मौत के कारणों पर खामोश रहे। लेकिन बाद में उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि मृत्यु प्रमाण पत्र पर उनसे गलत जानकारी देकर दस्तखत लिए गए। अब डॉक्टर गोकुल गोकाणी ने योगेश ठक्कर के केस में अपनी तरफ से शपथपत्र दाखिल किया है। उनका कहना है कि ओशो की मौत के सालों बाद भी कई सवालों के जवाब नहीं मिल रहे थे और मौत के कारणों को लेकर रहस्य बरकरार है।

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osho - फोटो : अमर उजाला

4. मौत के दिन क्या हुआ
ओशो की मौत पर 'हू किल्ड ओशो' टाइटल से क़िताब लिखने वाले अभय वैद्य का कहते हैं, "19 जनवरी, 1990 को ओशो आश्रम से डॉक्टर गोकुल गोकाणी को फोन आया। उनको कहा गया कि आपका लेटर हेड और इमरजेंसी किट लेकर आएं।" डॉक्टर गोकुल गोकाणी ने अपने हलफनामे में लिखा है, "वहां मैं करीब दो बजे पहुंचा। उनके शिष्यों ने बताया कि ओशो देह त्याग कर रहे हैं। आप उन्हें बचा लीजिए। लेकिन मुझे उनके पास जाने नहीं दिया गया। कई घंटों तक आश्रम में टहलते रहने के बाद मुझे उनकी मौत की जानकारी दी गई और कहा गया कि डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दें।" 

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