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दुश्मनों के गढ़ में बढ़ते गए लेफ्टिनेंट विजयंत थापर, कहते रहे-ऐसी कोई गोली नहीं बनी जो मुझे छू सके

Sun, 21 Jul 2019 05:00 PM IST
शाहरुख खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नोएडा Published by: शाहरुख खान Updated Sun, 21 Jul 2019 05:00 PM IST
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Kargil Vijay Diwas Vijayant Thapar Father VN Thapar narrated heroic heroism of his son
विजयंत थापर के कमरे में लगीं तस्वीरें - फोटो : लाल सिंह

28-29 जून 1999 की दरम्यानी रात में नॉल पहाड़ी पर तिरंगा फहराने का जुनून इस कदर सवार था कि 22 साल के लेफ्टिनेंट विजयंत थापर दुश्मनों की गोलियां उगल रहीं मशीनगन की परवाह किए बगैर साथियों के साथ आगे बढ़ते रहे। सिर पर फटका बांधे विजयंत को जेसीओ ने टोकते हुए कहा ‘साहब हेलमेट लगा लीजिये...’ लेकिन सामने से जवाब आया कि ‘ऐसी कोई गोली नहीं बनी जो मुझे छू सके’। भारत माता के इस वीर सपूत ने दुश्मनों के नापाक इरादों को नेस्तनाबूद कर नॉल पहाड़ी पर तिरंगा फहराया और आगे बढ़ते रहे। लेकिन इसी दौरान एक गोली विजयंत के माथे पर आ लगी। वह हवलदार तिलक सिंह की बांहों में आ गिरे।

Kargil Vijay Diwas Vijayant Thapar Father VN Thapar narrated heroic heroism of his son

शहीद बेटे के अदम्य साहस की वीरगाथा सुनाते हुए 76 वर्षीय पिता कर्नल वीएन थापर कहते हैं कि विजयंत ने एक महीने में जो सैन्य प्रशिक्षण लिया वो मैं पूरी उम्र में नहीं सीख सका। आज से 20 साल पहले कारगिल युद्ध में सेना को तोलोलिंग में पहली जीत दिलाने वाले इस सच्चे देशभक्त के अंदर बचपन से ही कुछ कर गुजरने का जज्बा था। विजयंत का सपना वायु सेना में फाइटर प्लेन उड़ाना था। बेटे की इच्छा पूरी करने के लिए पिता ने हिंडन एयरबेस पर संपर्क किया। महज 17 साल की उम्र में लड़ाकू विमान से माइक्रो राइड का मौका मिला। 1998 में आईएमए देहरादून से पास आउट होने के बाद 2 राजपूताना राइफल की पलटन कुपवाड़ा के लिए रवाना हुई। जिसमें दो महीने तक विजयंत ने आतंकियों से लोहा लिया। इसके बाद मई 1999 में कारगिल युद्ध छिड़ गया।

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वापस लौटूंगा तो सारी तनख्वाह उड़ा दूंगा...
मां तृप्ता थापर बताती हैं कि 1997 में आईएमए देहरादून ज्वाइन करने के बाद विजयंत से फोन पर तो बात हुई, लेकिन इसके बाद मिलने का मौका नहीं मिला। 1998 में ट्रेनिंग के बाद वह कुपवाड़ा चले गए। मई 1999 में उन्हें छुट्टी पर आना था लेकिन कारगिल में युद्ध छिड़ गया और छुट्टियां रद्द कर दी गईं। मां बताती हैं कि कारगिल जाने से पहले विजयंत ने फोन पर कहा था कि ‘मैं सितंबर या अक्तूबर में आऊंगा और सारी तनख्वाह उड़ा दूंगा। जी भर के सोऊंगा। इसके बाद उनकी चिट्ठी ही मिली।

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वापस लौटे तो चिट्टी फाड़ देंगे
माइनस 13 डिग्री सेल्सियस तापमान, 16 हजार फीट ऊंची नॉल पहाड़ी जहां सांस लेना भी मुश्किल था। वीर जवान अपने कंधों पर 20 किलो वजन लिए आगे बढ़ रहे थे। पाकिस्तान की तरफ से लगातार बम बरसाए जा रहे थे। दोनों तरफ खाई थी। पाकिस्तानी बंकर से बम गिरने की वजह से पलटन 2 राजपूताना राइफल के कई जवान शहीद हो गए। विजयंत ने हार नहीं मानी और 19 सैनिकों के साथ आगे बढ़ते हुए दुश्मनों के छक्के छुड़ाए। कर्नल वीएन थापर बताते हैं कि शहादत के बाद उनके साथ रहे कैप्टन तोमर घर आए और एक उन्होंने विजयंत का अंतिम पत्र दिया। इस चिट्ठी में लिखा था ‘प्रिय पापा, मम्मी जब तक आपको ये खत मिलेगा तब तक मैं आप लोगों को आसमान से देख रहा होऊंगा और अप्सराओं की मेहमान नवाजी का लुत्फ उठा रहा होऊंगा। अगर मैं दोबारा इंसान बना तो मैं सेना में भर्ती होऊंगा और देश के लिए लडूंगा। विजयंत ने ये पत्र लिखते हुए अपने साथियों से कहा था कि वापस आ गए तो चिट्ठी फाड़ देना नहीं तो घर पहुंचा देना।

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रुख्साना को दी नई जिंदगी
कुपवाड़ा में आतंकियों के हमले में वहां रहने वाली तीन साल की रुख्साना ने अपने पिता को खो दिया था। वह सुधबुध खो बैठी थी, लेकिन विजयंत ने अपने सरल स्वभाव और अपनेपन के अहसास से इस बच्ची को नई जिंदगी दी। फोन पर विजयंत ने मां को छोटी बच्ची के बारे में बताया और कहा कि उसके लिए तीन-चार सूट बनवाकर रखना। मां ने ऐसा ही किया। विजयंत तो वापस लौटे नहीं, लेकिन माता-पिता ने उनकी इस इच्छा को भी पूरा किया।

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