संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती के विवादों में घिरने के बाद इतिहास के वो किरदार फिर से सुर्खियों में आ गए हैं जो कहीं न कहीं भुला दिए गए थे। फिल्म में कुछ ऐतिहासिक किरदारों को लेकर देशभर में विवाद जारी है। इसी में अलाउद्दीन खिलजी का भी किरदार है जिसे फिल्म के साथ ही समाज में भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। फिल्म में जिस तरह से खिलजी के किरदार को दिखाया गया है इतिहास के जानकार उससे इत्तेफाक नहीं रखते। खिलजी की नकारात्मक छवि के विपरीत इतिहासकार मानते हैं कि उसने ऐसे कई सुधार भी किए जो आज भी प्रासंगिक हैं। इस कड़ी में हम आपको अलाउद्दीन खिलजी के बारे में कुछ ऐसे ही सच बताने जा रहे हैं।
आम आदमी के इतिहासकार और 'दिल्लीः अननोन टेल्स ऑफ ए सिटी' व 'दिल्ली दैट नो वन नोज' जैसी ऐतिहासिक किताबों के लेखक आरवी स्मिथ बताते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी वैसा नहीं था जैसा उसे फिल्म 'पद्मावती' में दिखाया गया है। फिल्म ने ऐसे बादशाह की छवि को बिगाड़ कर रख दिया है जो अगर ना होता तो शायद आज हिंदुस्तान की शक्ल कुछ और होती। खिलजी ने मंगोलों से हिंदुस्तान की रक्षा की थी।
आरवी स्मिथ ये भी बताते हैं कि अलाउद्दीन खिलजी ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण किया था ना कि पद्मावती को जीतने के लिए। लेकिन जब उसने पद्मावती के चर्चे सुने तो उत्सुकतावश उसे देखना चाहता था जिसके बाद रानी पद्मिनी एक बड़े आईने के सामने खड़ी हुई थीं जिसमें खिलजी ने सिर्फ उनका अक्स देखा था।
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balban lal mahal
- फोटो : सोशल मीडिया
अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी की हत्या कर गद्दी पाने वाले अलाउद्दीन के लिए उस वक्त एक सशक्त सेना और संतुष्ट जनता रखना सबसे बड़ी जरूरत थी। यही वजह है कि उसने ऐसे कई सुधार किए जो अर्थव्यवस्था और सेना के लिए आज भी उदाहरण माने जाते हैं। अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली में स्थित बलबन के लाल महल में अपना राज्याभिषेक 22 अक्तूबर 1296 को सम्पन्न करवाया। (तस्वीर में बलबन लाल महल)
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alauddin khilji
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प्रसिद्ध इतिहासकार बरनी ने भी बताया है कि अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए सबसे पहले खिलजी ने ही धर्म और शासन को अलग किया। अलाउद्दीन ने ही दरबार और सेना में परिवार के लोगों की जगह योग्यता के आधार पर लोगों को भर्ती करना शुरू किया।