हिमालय की वादियों के हुनर को संस्कृति में पिरोकर दर्शकों तक लेकर आने वाला हिमाचल प्रदेश पेवेलियन दर्शकों के मन को बहुत लुभा रहा है। प्रगति मैदान के हैंगर नम्बर 4 में बनाए गए हिमाचल प्रदेश पेवेलियन में हिमाचल के अलग-अलग इलाकों में सदियों से पहन रहे हुनर की कला का बेजोड़ प्रदर्शन किया गया है। यहां हिमाचल की लोक संगीत कला से लेकर आधुनिक युग के इंटरनेट की दुनिया के जुड़ाव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश किया गया है।
ट्रेड फेयर : वादियों के हुनर को संस्कृति में पिरोता हिमाचल प्रदेश पेवेलियन, देखें PICS
हिमाचल प्रदेश पेवेलियन को हिमाचल की वादियों के दृश्यों से सराबोर खूबसूरत प्रदर्शनी से सजाकर दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। पेवेलियन में घुसते ही दर्शकों को यहां हिमाचल के लोक संगीत की प्राचीन कालीन कला बजंतरी की धुन सुनाई देती है। बजंतरी हिमाचल की एक ऐसी कला है जो सिरमोर इलाके में सदियों से पनप रही है।
पेवेलियन में इस कला से दर्शकों को अवगत करवा रहे कलाकार ने बताया कि वह बजंतरी को पिछले 50 सालों से जीवंत बनाए हुए हैं। उनसे पहले उनके पूर्वज इस कला के जरिये हिमाचल की संस्कृति को बढ़ावा देते थे। बजंतरी में वह नगाडा, ढोल और शहनाई समेत पांच संगीत उपकरणों को एक साथ बजाते हैं। उनके इस हुन को जब नौ लोग मिलकर पेश करते हैं उसे नौगत कहा जाता है। हिमाचल प्रदेश पेवेलियन में लोग हिमाचल की बजंतरी कला धुन पर मदमस्त होते दिखाई दिए, जिन्होंने इस मौके का जमकर लुत्फ उठाया।
हथौड़े और छेनी से जीवंत हस्तकला
वहीं पेवेलियन में हस्तकला से लकड़ी पर हथौड़े और छेनी की मदद से भगवान गणेश की प्रतिमा उकेरने वाले कलाकार दल्लूराम जी ने बताया कि वह पिछले 40 सालों से इस हुनर को अपनी नई पीढिय़ों को सिखा रहे हैं। उन्होने बताया कि वह एक पतली हथौड़ी और कई प्रकार की छेनियों के प्रयोग से लकड़ी के सपाट तख्ते पर बेहतरीन चित्रकारी करने में माहिर हैं। पेवेलियन में उन्होंने लकड़ी पर भगवान गणेश की प्रतिमा को बखूबी उकेर कर दिखाया जिससे पेवेलियन में मौजूद दर्शकों ने हिमाचल के इस अनछुए पहलू के बारे में जाना।
छोटे औजारों की चोट से बनते हैं देवी-देवताओं के मुखौटे
हिमाचल प्रदेश पेवेलियन में पीतल की एक सपाट चादर के टुकड़ें पर हैरन (लोके का आयताकार छोटे बॉक्स जैसा टुकड़ा), चोंचनुमा हथौड़ी और बारीक छेनी की मदद से देवी-देवताओं के मुखौटे तैयार करने के हुरन को बखूब प्रदर्शित किया गया है। यहां इस कला को प्रदर्शित करते हिमाचल के कुल्लू निवासी ज्ञानचंद सोनी ने बताया कि वह करीब 25 सालों से इस कला को हिमाचल की संस्कृति में पिरोने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हैरन पर पीतल की चादर को रखकर उसपर हथौड़ी और छेनी के मदद से मखौटे की आकृति को आकार दिया जाता है। उन्होंने बताया कि धार्मिक रथ यात्राओं में रथों के आगे लगने वाले मुखौटे इसी कला के जरिये तैयार किए जाते है।