जब एक दूधवाले को बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने किया फोन
गाजियाबाद के शरफाबाद गांव का धर्मपाल यादव शुरुआत में जगदीश नगर में डेयरी चलाने वाला और रोजाना साइकिल से दिल्ली में कुछ घरों में दूध पहुंचाने वाला सामान्य दूधिया था।
जब एक दूधवाले को बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने किया फोन
1970 में उसका शराब माफिया किंग कहने जाने वाले बाबू किशनलाल से ऐसा मेलजोल हुआ कि कुछ ही दिनों में वह जरायम की दुनिया के खतरनाक चेहरे डीपी यादव के रूप में पहचाना जाने लगा। उसकी पहचान वाइन किंग के रूप में भी होने लगी। बाद में किशनलाल ने अपने इस शातिर दिमाग शागिर्द को अपना पार्टनर बना लिया।
जब एक दूधवाले को बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने किया फोन
पैसा आते ही यादव ने अपने अपराधों पर राजनीतिक कवच चढ़ाने के लिए सियासी पहचान बनानी शुरू कर दी। पहले वह गांव का प्रधान बना और फिर धन व दबंगई के बल पर ब्लाक प्रमुख का चुनाव जीता। डीपी यादव ने 1988 में कानपुर के फूलबाग मैदान में आयोजित मुलायम सिंह यादव की रैली में लोकदल की सदस्यता लेकर अपने राजनीतिक पारी की शुरुआत की।
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यह वही दौर था जब राजनीति में दबंग छवि वालों का प्रवेश शुरू हुआ था। मुलायम सिंह ने डीपी यादव को बुलंदशहर से विधानसभा चुनाव लड़ाया तो उनके जैसे दबंग छवि के प्रकाश पहलवान और महेंद्र भाटी को भी टिकट दिया। प्रकाश पहलवान व डीपी की पटरी नहीं खाती थी।
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इस वजह से जब प्रकाश पहलवान की हत्या हुई तो उसमें डीपी यादव का नाम आया। प्रकाश को भाटी का करीबी माना जाता था। ऐसे में डीपी और भाटी में ठन गई। बाद में भाटी की भी हत्या हो गई।