दिल्ली के डॉक्टरों ने भी माना कि प्रदूषण बना रहा है महिलाओं को बांझ..
33 साल की अंकिता (बदला हुआ नाम) शादी के 7 साल बाद भी मां नहीं बन पाई। वह मधुमेह और हाइपरथायरोडिज्म (अतिगलग्रंथिता) से पीड़ित है। आईवीएफ तकनीक भी इनके लिए कारगर साबित नहीं हुई। जब दिल्ली में अंकिता की जांच हुई तो पता चला कि उसकी परेशानी के पीछे अंडाशय में डिंब (अंडा) नहीं होना था।
डॉक्टरों का कहना है कि ये कोई पहला केस नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से महिलाओं में बांझपन बढ़ रहा है। जीवनशैली में बदलाव के साथ दिल्ली जैसे शहरों में प्रदूषण की मार महिलाओं के शरीर को नुकसान दे रही हैं। एक वक्त था जब महिलाएं 40 या 45 साल की आयु के बाद गर्भधारण नहीं कर सकती थीं। लेकिन अब ये आयुवर्ग घटकर 27 से 28 वर्ष तक आ चुका है।
मंगलवार को एक कार्यक्रम में नोवा इवी फर्टिलिटी की सलाहकार डॉ पारुल सहगल बताती हैं कि समय से पहले अंडाशय में खराबी आने को प्रीमेच्योर ओवेरियन फेल्योर (पीओएफ) से पहचान करते हैं। लगभग 1-2 प्रतिशत भारतीय महिलाएं 29 से 34 साल के बीच रजोनिवृत्ति के लक्षणों का अनुभव करती हैं। इसके अतिरिक्त 35 से 39 साल की उम्र के बीच महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 8 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
नोवा इवी फर्टिलिटी और स्पेन के इवी क्लिनिक के अध्ययन में निष्कर्ष निकला है कि यूरोप की महिलाओं की तुलना में भारतीय महिलाओं की ओवरीज छह साल अधिक तेज है। पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) महिलाओं में बांझपन का सबसे सामान्य कारण माना जाता है, जो लगभग 20 फीसदी महिलाओं में होता है।