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दिवाली सिर पर और अबतक नहीं बना मिलावटखोरों से निपटने का एक्शन प्लान

Wed, 11 Oct 2017 10:05 AM IST
यशवी गोयल/ अमर उजाला, फरीदाबाद
यशवी गोयल/ अमर उजाला, फरीदाबाद Updated Wed, 11 Oct 2017 10:05 AM IST
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diwali is to come and till now no action plan is made for adulterants
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मिलावट का धीमा जहर आपकी सेहत पर भारी पड़ रहा है लेकिन सरकार की जिस एजेंसी के कंधों पर इसकी निगरानी का जिम्मा है वो महज खानापूर्ति कर रही है। त्योहारी सीजन शुरू हो चुका है। मिलावट से निपटने के लिए खाद्य सुरक्षा विभाग ने कागजी प्रक्रिया तो शुरू कर दी है लेकिन क्या वाकई मिलावटखोरी से निपटने में गंभीरता दिखाई जा रही है या सिर्फ सैंपल भरने के नाम पर औपचारिकता निभाई जा रही है। यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

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त्योहार का नाम सुनते ही लोगों के मन में मिठाई का ख्याल आने लगता है। इस मौसम में मिलावटी मिठाई का खतरा भी बढ़ जाता है लेकिन लोगों को मिलावट के जहर से बचाने के लिए जिला खाद्य सुरक्षा विभाग ने अब तक एक्शन प्लान ही नहीं बनाया है। मिठाइयों के सैंपल भरने की प्रक्रिया ही अब तक शुरू नहीं हो पाई है।

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...तो क्या फायदा ऐसे विभाग का
मिलावटखोरों पर नकेल कसने के लिए सरकार ने खाद्य सुरक्षा विभाग बनाया हुआ है। अक्सर त्योहारी सीजन में यह विभाग कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखाई देता है लेकिन इस सक्रियता पर भी सवाल उठाए जाते हैं। मसलन, मिलावट से निपटने का ख्याल इस विभाग को त्योहार से कुछ दिन पहले ही आता है। मिठाइयों आदि के सैंपल लिए जाते हैं, लेकिन त्योहार बीतने के कई दिनों बाद रिपोर्ट आती है, तब तक मिलावटखोर अपने काम को अंजाम देकर मोटा मुनाफा कमा चुके होते हैं।

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महज 10 फीसदी सैंपल फेल
आम आदमी हर चीज में मिलावट की दुहाई देता है लेकिन सरकारी एजेंसी ऐसा नहीं मानती। कम से कम आंकड़े तो यही बयां कर रहे हैं। खाद्य सुरक्षा विभाग ने बीते सात साल में छापेमारी कर कुल 1083 खाद्य पदार्थों के सैंपल लिए, जिनमें से महज 10 फीसदी यानी 148 सैंपल ही फेल पाए गए। विभाग की सैंपलिंग प्रणाली पर विश्वास जताया जाए तो देश के सबसे प्रदूषित शहरों में गिने जाने वाले फरीदाबाद में मिलावट का खेल ज्यादा नहीं खेला जा रहा है।

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आंकड़े खोल रहे विभाग की पोल
मिलावटखोरी के खिलाफ खाद्य सुरक्षा विभाग कितना अलर्ट है, इसका अंदाजा पिछले छह साल के आंकड़े देखकर लगाया जा सकता है। विभाग अपनी कार्रवाई का पैमाना अगर खाद्य पदार्थों की सैंपलिंग को मानता है तो इसमें भी लगातार फिसड्डी साबित हो रहा है। आंकड़ों की मानें तो मिलावट से निपटने के लिए बनाई गई एजेंसी छापेमारी में भी साल दर साल पिछड़ रही है। साल 2015 के बाद से छापेमारी अभियान लगातार सुस्त पड़ता जा रहा है।

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