हाईकोर्ट ने 71 वर्षीय बुजुर्ग से माफी मांगी है क्योंकि निचली अदालत के एक जज के आदेश पर बुजुर्ग को 20 दिन इहबास (मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान) में गुजारने पड़े थे।
हाईकोर्ट ने इहबास में गुुजारी गई अवधि को अवैध हिरासत करार दिया है। सड़क दुर्घटना के 10 साल पुराने मामले की धीमी सुनवाई के कारण बुजुर्ग आपा खो बैठे थे जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें इहबास भेजने का निर्देश दिया था।
जस्टिस एस. मुरलीधर व जस्टिस आईएस मेहता की खंडपीठ ने रामकुमार, उसके परिजनों व याची रविंद्र से माफी मांगते हुए कहा हृदय रोग से पीड़ित बुजुर्ग को इहबास में अवैध हिरासत के कारण काफी कष्ट झेलना पड़ा। इस मामले में रामकुमार के जीवन व स्वतंत्रता तथा निजता का हनन हुआ है।
हाईकोर्ट ने जबरन पागलखाने भेजने के बढ़ते मामलों के मद्देनजर मानसिक अस्पतालों व संस्थाओं का निरीक्षण कर यह पता लगाने का निर्देश दिया है कि वहां कितने लोगों को अवैध रूप से रखा गया है। पीड़ित के परिजनों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 2017 में मजिस्ट्रेट के उस आदेश को खारिज कर दिया था जिसमें बुजुर्ग को इहबास भेजने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए पीड़ित बुजुर्ग को मुआवजा देने का निर्देश दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को दिया है। इसके अलावा कोर्ट ने इहबास में बुजुर्ग को जबरन रखने वाले डॉक्टरों के कृत्य की पड़ताल करने का निर्देश मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को दिया है। इसके अलावा कोर्ट ने मानसिक रूप से पीड़ित लोगों से संबंधित कानूनों की जानकारी पुलिस, जजों व डॉक्टरों को देने के लिए कार्यशाला का आयोजन करने निर्देश दिल्ली ज्यूडिशियल एकेडमी को दिया है।