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कश्मीर के लिए लड़ाई लड़ने वाले इस बड़े नेता की मौत आज भी है एक रहस्य
Thu, 06 Jul 2017 06:42 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नर्ई दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नर्ई दिल्ली
Updated Thu, 06 Jul 2017 06:42 PM IST
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shyama prasad
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“एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा” देश के अभिन्न अंग जम्मू एवं कश्मीर के विषय में बुलन्द आवाज में ऐसा कहने वाले डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की मौत आज भी एक रहस्य है। धारणा तो यह भी है कि तात्कालीन सत्ता के खिलाफ जाकर सच बोलने की जुर्रत करने वाले डॉ. मुखर्जी को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। देश की सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वाले सख्श डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी का जन्म आज के ही दिन सन 1901 में कोलकाता हाई कोर्ट के ज़ज आशुतोष मुख़र्जी के घर हूआ था। यह तो सभी जानते है परन्तु उनकी मृत्यु किन हालातों में हुई इसकी खबर आज भी आम आवाम को नहीं है, आइए जानते है डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की मृत्यू का रहस्य।
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sheikh abdullah
- फोटो : सोशल मीडिया
भारत के विभाजन के बाद शेख अबदुल्ला को विवादित राज्य जम्मू एवं कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया। उस समय के तात्कालीन इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख बीएन मलिक ने अपनी किताब ‘माई इयर्स विद नेहरू: कश्मीर’ में लिखा है कि शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि सारे डोगरा कश्मीर छोड़कर भारत चले जाएं। वह जम्मू एवं कश्मीर को एक स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे। यह बात और डोगरों पर हो रहा अन्याय डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी से देखा न गया।
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shyama prasad
उस समय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधान के अनुसार कोई भी भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता। परन्तु डॉ. मुखर्जी इस प्रावधान के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने इस प्रावधान का विरोध करने के लिए तथा डोगरा समुदाय की रक्षा के लिए भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर जाने की योजना बनाई।
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atal bihari vajpayee
- फोटो : सोशल मीडिया
8 मई, 1953 को सुबह 6:30 बजे डॉ. मुखर्जी बिना परमिट लिए हुए दिल्ली रेलवे स्टेशन से पैसेंजर ट्रेन में अपने समर्थकों के साथ सवार होकर पंजाब के रास्ते जम्मू के लिए निकले। अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैध और कुछ पत्रकार भी उनके साथ थे।
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Golden Temple of Amritsar
पंजाब सरकार की योजना थी कि उन्हे गुरदासपुर में गिरफ्तार कर लिया जाए और उन्हें पठानकोट न पहुंचने दिया जाए। परन्तु न उन्हें गुरदासपुर न तो अमृतसर में, न पठानकोट में और न ही रास्ते में कहीं और गिरफ्तार नहीं किया गया।
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