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Independence Day Special : 70 साल बाद भी इन 6 चीजों से आजादी के लिए तड़प रहा है देश

Wed, 16 Aug 2017 09:21 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद
ब्यूरो/अमर उजाला, फरीदाबाद Updated Wed, 16 Aug 2017 09:21 AM IST
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country should get independence from illiteracy and poverty
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हम आजादी के 71 वें वर्ष में पहुंच गए हैं। इतने सालों में देश ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति की है, लेकिन देश की सबसे बड़ी चुनौतियों से हमें अब भी लड़ना पड़ रहा है। अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी अब तक खत्म नहीं हुए हैं। आज यह समस्याएं हर सरकार के लिए एक चुनौती बन चुकी हैं लेकिन अफसोस आज तक इनका हल नहीं हो सका है। आधुनिकता की दौड़ में सामाजिक कुरीतियां देश की छवि को धूमिल कर रही हैं। अपराध एवं बाल श्रम के बढ़ते मामले देश की छवि को खराब कर रहे हैं। हम सबको आज इन चुनौतियों से जल्द निपटने का संकल्प लेना होगा। हमारे जिले में भी कई समस्याएं हैं जो आज तक हल नहीं हो सकी हैं। पेश है पूरी रिपोर्ट :
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अशिक्षा 
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बावजूद यह शहर अशिक्षा के कलंक से दूर नहीं हो पाया है। शिक्षा महंगी होने के चलते कई विद्यार्थी इससे वंचित हैं। वहीं प्राथमिक स्तर पर ड्राप आउट बच्चों को जोड़ने के लिए कोई खास प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। आजादी के 71 वें वर्ष पर सरकार को शिक्षा का एक स्तर बनाना होगा। बारहवीं तक शिक्षा को अनिवार्य कर पूर्ण रूप से मुफ्त करना होगा ताकि अशिक्षा का कलंक जल्दी दूर हो जाए। शहर की स्लम बस्ती में रहने वाले कई बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं, जिनकी पहचान शिक्षा विभाग नहीं कर सका है। इसके लिए सघन अभियान चलाने की जरूरत है ताकि देश तरक्की की उड़ान भर सके।
जिले की स्थिति : 
विश्वविद्यालय की संख्या - 3 
कॉलेजों की संख्या - 8 
सरकारी एवं निजी स्कूलों की संख्या - 850 
फोकस करने की जरूरत - शहर की स्लम बस्तियों पर
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गरीबी 
शहर में साइकिल चलाने वाले, मजदूरी करने वाले कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी दिन की कमाई से शाम को घर का चूल्हा जलता है। अशिक्षा के कारण गरीबी की दीवार मोटी होती जा रही है। नोटबंदी के समय भी ऐसे कई मजदूर सामने आए थे जिन्हें बासी रोटी नसीब हो रही थी। गरीबी को दूर करने के लिए शहर में प्रौढ़ शिक्षा केंद्र नियमित रूप से चलाना चाहिए। मजदूरों का उनकी रुचि के आधार पर कौशल विकास किया जाना चाहिए। जो मजदूर काम नहीं कर सकते उन्हें और जरूतरमंद गरीब को राशन देने की अलग से व्यवस्था की जानी चाहिए। फरीदाबाद एवं बल्लभगढ़ के लेबर चौक पर कई मजदूर खाली हाथ रोजाना घर लौटते हैं, उन्हें कुशल बनाने से देश को गरीबी से आजादी मिल सकेगी।
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बेरोजगारी 
दिल्ली एनसीआर की इस औद्योगिक सिटी में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या बढ़ती जा रही है। जो युवा शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं, उनको रोजगार नसीब नहीं हो रहा है। स्कूल, कॉलेजों में इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव में उनका कौशल विकास नहीं हो सका है। ऐसे में कंपनियों की तरफ से नौकरी के अवसर नहीं दिए जा रहे हैं। कंपनियों में पहुंचने पर यह सवाल किया जाता है कि क्या काम आता है, तब विद्यार्थी कोई जवाब नहीं दे पाते हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में बदलाव कर प्रायोगिक ज्ञान की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि पढ़ाई पूरी होते ही युवा वर्ग अपनी कमाई से घर को सहारा दे सकें। फरीदाबाद में हर वर्ष हजारों की संख्या में शिक्षित बेरोजगार सामने आ रहे हैं, जिनको नौकरी पाने के लिए भटकना पड़ रहा है।
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सामाजिक कुरीतियां 
हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘टॉयलेट’ ने सामाजिक कुरीतियों के मुंह पर तमाचा मारा है। फरीदाबाद का ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र दहेज प्रथा, निम्न जातियों से भेदभाव करने की कुप्रथा से दूर नहीं हो पाया है। दहेज प्रथा के मामले पुलिस केे सामने लगातार आ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह अशिक्षित लोगों की तरफ से किए जा रहे हैं, बड़ी संख्या में शिक्षित वर्ग इसमें शामिल है। इनको दूर करने के लिए लोगों को समय के साथ आगे बढ़ना होगा। अपनी सोच में बदलाव करना होगा। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं को इसके प्रति जागरूक करना होगा। इसके लिए युवा पीढ़ी का सहयोग लेना होगा। सामाजिक कुरीतियों से आजादी मिलने पर ग्रामीण भारत तरक्की कर पाएगा।
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