अयोध्या की जमीन पर राम मंदिर बनाने की मांग और उसे लेकर लड़ी गई लड़ाई सदियों पुरानी है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही शनिवार को अपना फैसला सुनाकर इस विवाद पर पूर्णविराम लगा दिया हो, लेकिन इससे जुड़े कई पुराने किस्से हैं जो इस सफर के एक-एक कदम को बयां करते हैं। आगे पढ़ें 90 के दशक का ऐसा ही एक किस्सा जिसमें हम बता रहे हैं कि उन दिनों कारसेवकों को अयोध्या तक पहुंचने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता था।
अयोध्या जाने का ऐलान करने पर ही कैद कर लिए जाते थे कारसेवक, जनानखाना में छिपते-छिपाते पूरा किया सफर
कई कारसेवकों को दिल्ली में ही कैद कर लिया गया
दिसंबर 1992 में दिल्ली के चांदनी चौक से भी कई कारसेवकों ने अयोध्या जाने की घोषणा की थी। जैसे ही प्रशासन को पता चला, कोतवाली पुलिस थाने ने उन्हें हिरासत में लेकर यमुना पार स्थित एक स्कूल में कैद कर दिया। इसी तरह 4 दिसंबर से 9 दिसंबर तक कई लोगों को दिल्ली के अलग-अलग हिस्से में हिरासत में रखा गया। स्कूल में चार दिनों तक कैद रहने वाले प्रवीण शंकर कपूर बताते हैं कि चांदनी चौक के युवकों ने ऐलान किया था कि कारसेवा के लिए अयोध्या जाएंगे। इतना पता चलते ही सभी को हिरासत में ले लिया गया।
आंखों के आसपास लगाना पड़ा नमक
प्रवणी शंकर कपूर बताते है कि दिल्ली के कई लोगों में आज भी कारसेवा के लिए अयोध्या नहीं जाने की कसक रह गई। मंदिर मार्ग स्थित काली बाड़ी मंदिर में बड़ी संख्या में कारसेवक उस दौरान पहुंचे हुए थे। अचानक से पुलिस ने आंसू के गोले दाग दिए। इससे कार सेवक काफी परेशान हो गए। इसके बाद इलाके के लोगों ने मंदिर अपने-अपने घरों से नमक लेकर कार सेवकों के लिए पहुंचे। आंसू के गोले से परेशान लोगों ने आंखों के समीप नमक लगाकर राहत की सांस ली।
जनानाखाना में छुप कर अयोध्या पहुंचे कारसेवक
दिल्ली से अयोध्या के लिए कूच करने वाले कारसेवक राष्ट्र प्रकाश बताते हैं कि कारसेवकों को लोग भगवान के दूत के रूप में मानते थे। जब उत्तर प्रदेश पुलिस गांव के घरों में छापा मारती थी तो गांव की औरतें अपना जनाना खाना खाली कर देती थीं, ताकि कारसेवक वहां छुप सकें और पुलिस से महफूज रह कर अयोध्या पहुंच सकें। कारसेवक जहां भी जाते थे लोगों के मन में यह रहता था कि भगवान राम के साथी आ रहे हैं।
बकौल राष्ट्र प्रकाश कारसेवकों को कष्ट तो जरूर हुआ, लेकिन एक अच्छा अनुभव मिला। अयोध्या के रास्ते में कई कारसेवक को पुलिस फायरिंग में गोलियां लग जाती थी, उन्हें अन्य कारसेवक सड़क पर रख देते थे, ताकि पुलिस उन्हें कम से कम अस्पताल तक पहुंचा कर प्राथमिक उपचार दिला सके। अक्तूबर 1990 में दिल्ली से रवाना हुए कारसेवक लखनऊ स्टेशन पर जैसे ही उतरने लगे उन्हें दूर से ही नहीं उतरने का इशारा किया गया। फिर सुनियोजित तरीके से ट्रेन की चेन पुलिंग कर गोंडा के करीब उतारा गया।