करीब पांच सदी पुराने विवाद और 134 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या भूमि विवाद पर फैसला सुना दिया। मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने एकमत से अयोध्या को भगवान का जन्मस्थान मानते हुए पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन रामलला विराजमान को सौंपकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि सबूतों और बयानों से साबित होता है कि विवादित स्थल को हिंदू जन्मस्थान के रूप में मानते हैं और इसी जगह बाबरी मस्जिद मनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि हिन्दुओं के विश्वास व आस्था केसाथ-साथ कई मैखिक व दस्तावेजीय साक्ष्य हैं जो यह साबित करते हैं कि जिस जगह पर वर्ष 1528 में बाबरी मस्जिद बनाई गई थी, वह जगह हमेशा से भगवान राम का जन्मस्थान रहा है। पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा है कि बाबरी मस्जिद बनने से पहले और बाद में हिन्दुओं की आस्था और विश्वास था कि विवादित जगह भगवान राम का जन्मस्थान था। और यह बात मौखिक व दस्तावेजीय सबूतों से प्रमाणित होती है।
कोर्ट ने कहा कि ब्रिटिश काल में वहां पर ग्रिल लगाई गई और मस्जिद को भीतरी अहाते में कर दिया गया था। तब बाहरी अहाते में हिन्दू पूजा पाठ करते थे। कोर्ट ने पाया कि सरकार द्वारा प्रकाशित किए गए गेजेटियर में भगवान राम के जन्मस्थान पर 1528 में बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि गेजेटियर कोई अंतिम साक्ष्य नहीं माना जा सकता लेकिन यह माना जा सकता है उसकेदर्ज बातों का किसी उचित साक्ष्यों के इनकार किया गया। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष ने इस पर असहमति नहीं जता सका।
मोहम्म कासिम, मोहम्मद यासीन, हाजी महबूब अहमद सहित अन्य के मौखिक बयानों पर भरोसा जताते हुए कहा कि इससे साफ साबित होता है कि उस जगह पर हिन्दुओं की आस्था थी कि वह भगवान राम का जन्मस्थान है। ऐसे में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भगवान राम का जन्म बाबरी मस्जिद की तीन गुंबदों के नीचे है। कोर्ट ने यह भी पाया कि कई जगहों पर बाबरी मस्जिद को जन्मस्थान मस्जिद कहा गया है। लिहाजा ये भी इशारा करते हैं कि बाबरी मस्जिद भगवान राम केजन्मस्थान पर स्थित था।
आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसले के साथ राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का पटाक्षेप किया। इस फैसले में वैसे तो सबसे अहम बात विवादित स्थल को राम जन्म भूमि स्वीकार करना ही रहा। लेकिन इसके अलावा भी 45 मिनट में पढ़कर सुनाए गए 1045 पेज के इस इस फैसले में कई शब्द थे, जो फैसले में बुरी तरह छाये रहे।