उत्तराखंड की धरती की हरीतिमा संरक्षित कर इसे सुंदर बनाए रखने और इसे लाल रंग यानी खतरों के प्रतीक से जुड़ी विभीषिका से सुरक्षित रखने की सोच सुंदरलाल बहुगुणा के नाम में ही समाहित प्रतीत होती है। इसी सोच को धरातल पर उतारने में उन्होंने सारा जीवन लगा दिया।
दुखद: पर्यावरणविद सुंदर लाल बहुगुणा का निधन, कोरोना संक्रमण के बाद एम्स ऋषिकेश में थे भर्ती
बहुगुणा के जीवन पर उनकी परिश्रमी और कर्मठ माता और पत्नी का विशेष प्रभाव रहा। वे महात्मा गांधी, विनोबा भावे, गौरा देवी और श्रीदेव सुमन से भी प्रेरित रहे। उनके जीवन में मैन ऑफ ट्रीज कहे जाने वाले इंग्लैंड के रिचर्ड सेंट बार्बी बेकर की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
जीवन प्रयंत जन संघर्षो के लिए जूझते रहे, कई पुरस्कारों से नवाजे गए चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदर लाल बहुगुणा
चिपको आंदोलन, शराब विरोधी आंदोलन और टिहरी बांध निर्माण के विरोध में गांधीजी की तर्ज पर सत्याग्रह उनके प्रमुख आंदोलनों में शामिल रहे, लेकिन सामाजिक सुधार के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा उनमें 13 वर्ष की उम्र से ही रहा जब उन्होंने श्रीदेव सुमन से प्रभावित होकर टिहरी राजशाही से स्वतंत्रता और इसके भारत में विलय के आंदोलन में विशेष भूमिका निभाई।
वे इस दौरान छह माह जेल में भी रहे। तब वे प्रजा मंडल के सदस्य भी रहे। 1956 में विवाह के बाद वे पत्नी विमला के सुझाव पर ग्रामीणों की समस्या को नजदीक से समझने और सुलझाने के उद्देश्य से गांव लौट गए और बाद में सिलयारा में आश्रम बनाकर रहने लगे।
2 of 6
सुंदरलाल बहुगुणा
- फोटो : फाइल फोटो
तवाघाट और कुमाऊं विवि के तमाम कार्यक्रमों में बहुगुणा के निकट सहयोगी रहे इतिहासविद प्रो. अजय रावत बताते हैं कि विनोबा भावे से प्रेरणा लेकर उन्होंने 1960 से पूरे उत्तराखंड की पांच हजार किलोमीटर की यात्रा की। 1970 के दशक में गढ़वाल में नंदा देवी बायो रिजर्व बनाने, भारत तिब्बत व्यापार प्रभावित होने, स्थानीय लोगों को वन संपदा का लाभ न देने, इलाहाबाद की स्पोर्ट्स कंपनी खेल सामग्री के निर्माण के लिए भारी तादाद में अंगू के पेड़ काटने का ठेका दे देने से लोग उद्वेलित थे।
3 of 6
सुंदरलाल बहुगुणा
- फोटो : फाइल फोटो
1970 में क्षेत्र में आई भारी बाढ़ के लिए भी लोग वनों की अंधाधुंध कटाई को कारण मानते थे। रावत के अनुसार इन सबके बीच ग्राम रेणी-राता में पेड़ काटने के विरोध में गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाओं ने पेड़ों से लिपट कर विरोध किया, जिससे वहां कटान रुक गया। बहुगुणा ने महिलाओं के इस आंदोलन को भरपूर समर्थन दिया और इस मुहिम को समूचे उत्तराखंड में फैलाया। रावत ने बताया कि 1977 में इंग्लैंड के मैन ऑफ ट्रीज कहे जाने वाले रिचर्ड बार्बी बेकर से मुलाकात के बाद बहुगुणा ने विश्वभर के देशों की यात्रा कर चिपको आंदोलन को 107 देशों तक फैलाया।
4 of 6
सुंदरलाल बहुगुणा
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
बहुगुणा ने पर्यावरण पर अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें ‘वह मानव जिसका जीवन वनों को समर्पित रहा’ रिचर्ड के जीवन पर आधारित थी। चिपको आंदोलन, पर्यावरण की रक्षा में उल्लेखनीय कार्यों के लिए उनकी पत्नी विमला बहुगुणा को भी 1995 में जमना लाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
5 of 6
सुंदरलाल बहुगुणा
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना के दौरान बहुगुणा विवि के कुलपति प्रो. डीडी पंत के निकट संपर्क में आए और उनका विवि व इसके कार्यक्रमों में सतत आना जाना लगा रहा। तवाघाट के निकट खैला, पल्याला, सांखुड़ी गांव में भीषण तबाही होने पर वे यहां आए और प्रभावितों को तराई में विस्थापित करने के लिए बृहद आंदोलन चलाया। 1977 में नैनीताल में वनों की नीलामी के विरोध में चले आंदोलन में वे स्वयं नहीं आ पाए, लेकिन उनका विशेष सहयोग रहा।