कार्तिक मास की अमावस्या पर बुधवार को दिवाली मनाई जाएगी। महालक्ष्मी पूजन के लिए प्रदोष काल के बाद से आधी रात तक का समय श्रेष्ठ है। इस बार पूजन के चार मुहूर्त में किसी भी मुहूर्त में पूजा की जा सकती है। इस दिन दीप प्रज्ज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, गणेश, कुबेर आदि का पूजन करने का विधान है।
दिवाली पर इस बार आयुष्मान-सौभाग्य और स्वाति नक्षत्र का मंगलकारी त्रिवेणी संयोग बनेगा। यह समृद्धि और सामर्थ्य प्रदान करने वाला योग होता है। इस त्रिवेणी संयोग में मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने से धन की वर्षा होगी। इस संयोग में मां लक्ष्मी की पूजा करने का सकारात्मक असर साधक के जीवन में लंबी आयु तक रहेगा।
इस बार दिवाली पर सालों बाद गुरु और शनि का भी दुर्लभ योग भी बन रहा है। मंगल ग्रह शनि के स्वामित्व वाली कुंभ राशि में रहेगा। शनि ग्रह गुरु के स्वामित्व वाली राशि धनु में रहेगा। ये तीनों ग्रह एक-दूसरे की राशि में रहेंगे। दिवाली पर गुरु ग्रह मंगल के स्वामित्व वाली वृश्चिक राशि में रहेगा।
ज्योतिषाचार्य गौरव आर्य ने बताया कि दिवाली के दिन सरसों के तेल के दिये जलाने से सभी कष्ट दूर होते हैं। अमावस्या तिथि मंगलवार रात 10:30 बजे से शुरू हो गई है। जो बुधवार रात 9:32 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल में शाम 7:10 बजे से 8:57 बजे तक शुभ की चौघड़िया रहने से इस योग में दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश कुबेर पूजन, बहीखाता पूजन, धर्म एवं गृह स्थलों पर दीप प्रज्ज्वलित करने का विशेष महत्व है। दीप प्रज्ज्वलन से अंधकार रूपी बुराई दूर होती है। साथ ही सरसों के तेल के धुएं से नुकसान पहुंचाने वाले कीट पतंगे भी मारे जाते हैं।
उन्होंने बताया कि दिवाली पर रात में विष्णु सहस्त्रनाम, लक्ष्मी सूक्त, सूक्त, पुरुषसूक्त आदि का पाठ करना शुभ माना जाता है। प्रदोष काल में दिवाली दीप प्रज्ज्वलन, महालक्ष्मी, गणेश व कुबेर का पूजन करने का विधान है। महालक्ष्मी पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह से 8 से 9:30 बजे तक, सुबह 10:30 बजे से दोपहर 1 बजे तक, दोपहर 1:30 बजे से शाम 6 बजे तक और शाम 7:30 बजे से 12:15 बजे तक रहेगा।