पहले ट्यूमर से जीतीं, फिर ओलंपिक में इतिहास रचकर देश का नाम रोशन किया, लेकिन खेल रत्न न मिलने से निराश हैं और दर्द छलका तो भावुक हो गईं। जानिए इनके बारे में सब कुछ।
रियो पैरालंपिक सिल्वर मेडलिस्ट दीपा मलिक का खेल रत्न बनने का सपना शनिवार को टूट गया। हाल ही में खिलाड़ियों को खेल मंत्रालय द्वारा प्रतिष्ठित राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई, लेकिन खेल रत्न पुरस्कार पाने वालों की लिस्ट में दीपा मलिक का नाम नहीं था। अनदेखी किए जाने को लेकर दीपा मलिक ने हरियाणा सीएम मनोहर लाल खट्टर को पत्र लिखा।
मुख्यमंत्री खट्टर ने भी खेल मंत्रालय से उनके नाम पर दोबारा विचार करने का अनुरोध किया, लेकिन उनकी अपील मंजूर न हो सकी। खट्टर ने 16 अगस्त को लिखे पत्र में कहा, ‘मलिक पैरालम्पिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं। मुझे लगता है कि दीपा मलिक को प्रतिष्ठित खेल रत्न पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप खेल रत्न के लिये उनके नाम पर विचार करें।’
वहीं खेल रत्न न मिलने से निराश मलिक ने कहा कि क्या मुझे 50 साल की उम्र में 2020 में एक और पदक जीतने की जरूरत होगी, तब यह पुरस्कार मिलेगा? दीपा मलिक ने उनका नाम ना भेजे जाने पर दुःख प्रकट करते हुए कहा कि एक और प्रदेश सरकार हरियाणा के सभी खिलाड़ियों को चाहे वो दिव्यांग हों, उन्हें एक जैसे सम्मानित करने की बात करती है लेकिन उनका नाम ना भेजे जाने का उन्हें दुख है।
17 साल से पैर काम नहीं करते। 31 ऑपरेशन हो चुके हैं और 183 टांके लगे। उसके बावजूद दीपा मलिक ने ऐसा इतिहास रचा कि देश में उन्हें पद्मश्री अवार्ड से नवाजा गया। व्हीलचेयर पर होने के बावजूद हिम्मत नहीं छोड़ी। खुद को मोहताज नहीं बनने दिया और एक ऐसी पहचान कायम की, जो दुनिया के लिए मिसाल बन गई। फिर पैरा ओलंपिक में देश को मेडल दिलाकर इतिहास रचा दिया।