ऑपरेशन ब्लू स्टार की 33वीं बरसीं पर पढ़िए, बगावत बर्बरता ब्रिटेन और बवाल की वो खौफनाक कहानी जो आज भी तन बदन में सिहरन पैदा कर दे।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
- फोटो : फाइल फोटो
ऑपरेशन ब्लू स्टार को जानने से पहले उन परिस्थतियों को जानना जरूरी है, जिसके कारण ये हालात पैदा हुए। पंजाब में हिंसा की शुरुआत 1978 में हुई थी। उसी समय सिख धर्म प्रचार संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले का नाम चर्चा में आया। 1981 के बाद जब पंजाब में हिंसक गतिविधियां बढ़ने लगीं तो भिंडरांवाले के ख़िलाफ लगातार हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगने लगे।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
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पुलिस का कहना था कि उनके ख़िलाफ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। अप्रैल 1983 में पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक एएस अटवाल की दिन दिहाड़े हरमंदिर साहिब परिसर में गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस का मनोबल लगातार गिरता चला गया। लोगों का नरसंहार होता देखकर इंदिरा गांधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
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पंजाब में स्थिति बिगड़ती चली गई। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार से तीन महीने पहले तक हिंसक घटनाओं में मरने वालों की संख्या 298 हो चुकी थी। वैसे ऑपरेशन ब्लू स्टार के हालात एक जून से ही बनने शुरू हो गए थे। एक जून को स्वर्ण मंदिर परिसर और उसके बाहर तैनात केंद्र रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स के बीच गोलीबारी हुई थी।
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स्वर्ण मंदिर परिसर में हथियारों से लैस संत जरनैल सिंह, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के लड़ाकों ने चारों तरफ़ खासी मोर्चाबंदी कर रखी थी। तीन जून को गुरु अर्जुन देव के शहीदी दिवस को लेकर हज़ारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में जमा थे। उधर, तीन जून तक ही भारतीय सेना अमृतसर में प्रवेश कर गई थी और स्वर्ण मंदिर परिसर को घेर चुकी थी।