दूसरे विश्व युद्ध की याद दिलाता है ये गुरुद्वारा, सिखों ने दिखाया था शौर्य, अंग्रेज भी हो गए थे कायल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गुरुद्वारा साहिब के प्रधान तारा सिंह ने बताया कि जब सैनिक अपने वतन लौट रहे थे, तभी अंग्रेज ने गांव के निवासी हवलदार शमशेर सिंह को गुरुग्रंथ साहिब का स्वरूप भेंट किया था। पहले स्वरूप को धर्मशाला में स्थापित किया गया। उसके बाद गुरुद्वारा साहिब का निर्माण किया गया। विदेशी धरती में बहादुरी की मिसाल पेश करने वालों में शाहपुर गांव के सैनिक हवलदार शमशेर सिंह, लखा सिंह, सूबेदार हजारा सिंह, सरदारा सिंह, बखतौर सिंह, लछमन सिंह, धर्म सिंह, कर्म सिंह, गुरनाम सिंह, गुरदियाल सिंह शामिल थे। हालांकि अब यहां इन लोगों का कोई वंशज नहीं रहता।
शाहपुर से चंडीगढ़ बनने के बाद प्रशासन ने धीरे-धीरे जमीन को अपने कब्जे में लेना शुरू किया। साल 1973 में प्रशासन ने गुरुद्वारा साहिब को छोड़कर गांव की करीब दो हजार बीघा जमीन का अधिग्रहण कर लिया। तारा सिंह ने बताया कि साल 1949 में गुरुद्वारे का जिस तरह निर्माण हुआ था, उसी प्रकार से अब भी इसे सरंक्षित रखा गया है। उसके पुराने स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। कमेटी के सदस्य इसका पूरा ध्यान रखते हैं। गुरुद्वारे के अंदर दो पेड़ भी हैं, जो करीब तीन सौ साल पुराने बताए जाते हैं। गुरुद्वारा साहिब शाहपुर की कमेटी की ओर से इन पेड़ों की देखरेख की जाती है ताकि इनकी पूरी तरह से देखभाल की जा सके।
अब तक 32 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों की मदद
गुरुद्वारा साहिब की ओर से सामजिक कार्य भी किए जाते हैं। हर साल कई गरीब बच्चों की पढ़ाई में मदद की जाती है। अब तक 32 हजार से भी अधिक बच्चे गुरुद्वारे की सेवाओं का लाभ उठा चुके हैं। यहां पर बाहर से आने वाले लोगों के ठहरने की व्यवस्था रखी गई है। इस गुरुद्वारे की एक खास बात और भी है। यहां पर बनने वाले लंगर में उन सब्जियों का इस्तेमाल किया जाता है, जो गुरुद्वारे में ही उगाई जाती है। इन सब्जियों को उगाने में किसी भी तरह का रासायनिक उवर्रक नहीं डाला जाता है।