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‘तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं’ तुम हट जाओ, कहा और जाकर दुश्मनों से भिड़ गया, पढ़ें शहीद की शौर्य गाथा

Thu, 26 Jul 2018 09:33 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Thu, 26 Jul 2018 09:33 AM IST
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Indian Army, Kargil Vijay Diwas, Kargil War Hero Captain Vikram Batra
विक्रम बत्रा
22 साल की उम्र थी, घायल अफसर से बोला- ‘तुम हट जाओ, तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं’ और जाकर दुश्मनों से भिड़ गया, फिर शहीद हो गया। पढ़िए इस परमवीर की शहादत की गौरव गाथा।
Indian Army, Kargil Vijay Diwas, Kargil War Hero Captain Vikram Batra
शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा
कारगिल युद्ध के दौरान इलाके के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु (प्वाइंट) को जीतने में अहम भूमिका निभाने वाले शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा अब भी अपने साथियों के दिलों में जिंदा हैं। चंडीगढ़ का डीएवी कॉलेज सेक्टर-10 हो या फिर पंजाब यूनिवर्सिटी का एमए अंग्रेजी विभाग या फिर सेक्टर-17 का एक सैलून। शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा यहां के हीरो हैं। शहीद के पिता गिरधारी लाल बत्रा ने बेटे की वीरगाथा सुनाई।
Indian Army, Kargil Vijay Diwas, Kargil War Hero Captain Vikram Batra
vikram batra
गिरधारी लाल बत्रा ने कहा कि विक्रम डीएवी कॉलेज में चार साल पढ़े, उसके बाद पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की, सीडीएस की तैयारी भी यहीं की और एमए अंग्रेजी में दाखिला लिया। उन्होंने बताया कि चंडीगढ़ से शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के दोस्त अब भी उन्हें फोन करते हैं। गिरधारी लाल बत्रा ने बताया कि हिमाचल प्रदेश पालमपुर के घुग्गर गांव में 9 सितंबर 1974 को विक्रम बत्रा का जन्म हुआ था।
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vikram batra
विक्रम ने स्नातक के बाद सेना में जाने का पूरा मन बना लिया और सीडीएस (सम्मिलित रक्षा सेवा) की भी तैयारी शुरू की। विक्रम को ग्रेजुएशन के बाद हांगकांग में भारी वेतन में मर्चेन्ट नेवी में भी नौकरी मिल रही थी, लेकिन सेना में जाने के जज्बे वाले विक्रम ने इस नौकरी को ठुकरा दिया। विक्रम को 1997 को जम्मू के सोपोर में सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। 1999 में कारगिल की जंग में विक्रम को भी बुलाया गया।

 
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Vikram Batra
इस दौरान विक्रम के अदम्य साहस के कारण उन्हे प्रमोशन भी मिला और वे कैप्टन बना दिए गए। श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त करवाने का जिम्मा भी कैप्टन विक्रम बत्रा को दिया गया। बेहद दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद विक्रम बत्रा ने अपने साथियों के साथ 20 जून 1999 को इस पोस्ट पर विजय हासिल की। इसके बाद सेना ने प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने की कवायद शुरू की। इसका जिम्मा कैप्टन विक्रम बत्रा को ही दिया गया।
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