42 साल देश की सेवा की और दुश्मनों को नाकों चने चबाए। आप भी जानिए, पूर्व सेनाध्यक्ष दलबीर सुहाग की बहादुरी के किस्से और उनके बारे में सब कुछ।
ये कहानी है भारत मां के एक ऐसे वीर सपूत की, जो उन सभी युवाओं के लिए एक मिसाल है जो सेना में भर्ती होकर देशसेवा करने का जज्बा रखते हैं। कड़ी मेहनत, ढृढ़ निश्चय, समर्पण और कुछ कर गुजरने की लगन ने हरियाणा के एक छोटे से गांव में जन्मे दलबीर सुहाग को सेना में सर्वोच्च जनरल के पद पर पहुंचाया। जनरल एसएचएफजे मानेकशॉ (बाद में फील्ड मार्शल के रैंक से सम्मानित किए गए) और जनरल जीजी बेवूर के बाद वे तीसरे सेना प्रमुख थे, जो गोरखा ब्रिगेड में शामिल थे।
जनरल दलबीर सिंह का जन्म 28 दिसम्बर, 1954 को हरियाणा में झज्जर जिले के बिशन गांव में हुआ था। हालांकि क्षेत्र के अन्य गांव की तरह ही खेती प्रधान गांव होने के बावजूद इस जाट बहुल गांव में से अधिक संख्या में युवक सेना में शामिल होते हैं क्योंकि वीरता के गुण वे अपने पूर्वजों से पाते हैं। भारतीय सेना का प्रमुख और जनरल बनने वाले जनरल सुहाग के शुरूआती दिन काफी सादगीपूर्ण थे। दलबीर की शुरूआती शिक्षा गांव के ईंटों वाले दो कमरों के प्राथमिक विद्यालय में हुई।
दलबीर सिंह के सैन्य जीवन की शुरुआत राजस्थान के सैनिक विद्यालय, चित्तौड़गढ़ (एसएससी) से हुई। जनरल दलबीर के ताऊ जी इस विद्यालय में घुड़सवारी सिखाते थे और उन्होंने दलबीर को सैनिक विद्यालय में पढ़ाने का सुझाव दिया। इस तरह 15 जनवरी, 1965 को कैडेट दलबीर सिंह के सैन्य जीवन की शुरूआत हुई। जून 1974 में लेफ्टिनेंट दलबीर सिंह का सेना में अफसर बनने का सपना पूरा हुआ। जनरल दलबीर सिंह को जून 1974 को 4/5 जीआर (एफएफ) में कमीशन दिया गया था।
यह एक ऐसी उपलब्धि थी, जिस पर उनके पिताजी, दादाजी, चाचाओं, ताऊओं तथा अन्य सभी परिजनों को गर्व था। 19 अप्रैल, 2011 से उन्हें 5 जीआर (एफएफ) रेजीमेन्ट का कर्नल और एक जनवरी, 2014 से गोरखा ब्रिगेड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। हालांकि भारतीय सेना की पुरानी परंपराओं के अनुसार, सेना प्रमुख को कई अन्य सैन्य और रेजीमेन्ट के ‘सम्मानित कर्नल' बनाया जाता है। जनरल दलबीर सिंह का गोरखा रेजीमेन्ट को चुनने के बारे में कहना है कि वह मेरा एक सोचा-समझा फैसला था क्योंकि मैं केवल पैदल सेना (इनफैन्ट्री) में ही शामिल होना चाहता था।