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1947 के गदर, मारधाड़ और कत्लेआम का वो दर्द, इस शख्स की कलाई पर जिंदा है आज तक
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 15 Aug 2018 08:17 AM IST
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स्वतंत्र भारत की तस्वीरें
चारों ओर मारधाड़...कत्लेआम...बर्बादी, वो खौफनाक मंजर याद करते ही सिहर उठता हूं। वो दर्द आज तक मेरी कलाई में मौजूद है, 1947 के गदर की एक कहानी सुनिए।
KASHMIR 1947
- फोटो : file photo
पूर्व बीजेपी मंत्री रहे हरमोहन धवन बताते हैं कि सात साल का था उस समय। बेस कैंप में जब तीन दिन के बासी आलू के परांठे मिले तो डूबता दिल थोड़ा संभला। ऐसे में कैसी खुशी। लगता था जिंदगी को एक दिन और मिल गया। यह आंखों देखा दर्द है उसी आजादी का जिसकी खुशी हम आज मना रहे हैं। धवन की कलाई पर आज भी बंटवारे का वह दर्द है जिसे देखते ही उन्हें याद आ जाता है वह दिल दहला देने वाला मंजर।
KASHMIR 1947
- फोटो : file photo
आजादी की खुशी की बात जुबां से निकलते ही धवन साहब की आंखों से सत्तर साल पुराना दर्द सामने आ गया। धवन ने बताया कि उस समय आजादी की खुशी से ज्यादा बंटवारे में बर्बादी का दर्द झेलना पड़ा। धवन उस समय अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के फतेहगंज जिला कैंबलपुर में थे। वह बताते हैं कि वह मोहल्ले में रहने वाले सुनियारे के घर पर अपने पिता के साथ गए तो मंजर देखकर उनका दिल दहल गया। वहां बच्चों की लाशें पड़ीं थीं।
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महिलाओं के क्षत-विक्षत शव पड़े थे। घर लौटे तो वह बीमार हो गए। दंगे का डर इतना ज्यादा था कि घर का दरवाजा बंद करके कनक की बोरियां लगा देते थे जिससे कि कोई दंगाई अंदर न आ सकें। घर छोड़ वाघा बार्डर आए तो ऐसा लगता था कि हालात सुधर जाएंगे और दो से तीन माह बाद वापस आ जाएंगे। वाघा बार्डर में एक कैंप लगा था वहीं पर पापा, बड़ी बहन, मां के साथ शरण ली। वहां तीन दिन तक खाने पीने को कुछ नहीं मिला। तीन दिन बाद एक हैलीकाप्टर से खाने के पैकेट फेंके गए तो सभी भाग कर उसी ओर लपक लिए।
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महिला स्वतंत्रता सेनानी
- फोटो : self
धवन ने बताया कि लिफाफा हाथ में आया तो खुशी थी लेकिन जैसे ही खोला तो पराठों में दुर्गंध थी। क्या करते जिंदा रहना था तो किसी तरह परांठे खाकर गुजारा कर लिया। वाघा बार्डर से जब ट्रेन से अंबाला आ रहे थे तो ट्रेन में पीने का पानी तक नहीं था। सामने स्टीम इंजन देखकर पिता ने कहा कि पानी की बूंदे टपक रही हैं वहीं से पानी पी लो। जब पानी पीने गया इंजन ने एकदम से गर्म भाप छोड़ दी जो कि हाथ पर लगी और कलाई झुलस गई, जिसके निशान आज भी हैं।