क्या आप जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी पर डॉ. प्रीतम सिंह पीएचडी कर चुके हैं और उन्होंने अपनी किताब में उनके जीवन के बारे में कई खुलासे किए थे, शायद ही कोई जानता हो।
भारतीय राजनीति में अजातशत्रु कहे जाने वाले जिन अटल जी के सम्मोहित करने वाली भाषण शैली का जमाना मुरीद रहा, वे अपना पहला भाषण स्कूल के वार्षिकोत्सव में मंच पर भूल गए थे। ऐसे कई सुने-अनसुने किस्से अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन पर पीएचडी कर चुके डॉ. प्रीतम सिंह की पुस्तक में मिलते हैं। अपने दादा की पोथियों और पिता की रचनाओं से तुकबंदी की कला सीखने वाले अटल जी के जीवन पर उनकी यह पुस्तक 2014 में प्रकाशित हुई थी।
अटल जी के काव्य का शिल्प पक्ष रखते हुए डॉ. प्रीतम सिंह ने अपनी पुस्तक में उनके परिवार, जन्म, स्कूल-कॉलेज छात्र जीवन, पत्रकार, साहित्यकार, राजनीति, विदेश यात्राओं और काव्य रचनाओं के साथ कई घटनाक्रमों को प्रस्तुत किया है। अमर उजाला से विशेष बातचीत में डॉ. प्रीतम ने बताया कि अटल जी के काव्य का मुख्य रस था राष्ट्रप्रेम था। उनकी अधिकतर रचनाएं वीर रस में रहीं, लेकिन साथ ही इनमें करुणा का भाव भी शुमार था।
उनकी रचना में वीर पुत्र, मेरी जननी के जगती में जौहर अपार, अकबर के पुत्रों से पूछो, क्या याद है मीना बाजार, क्या याद है उन्हें चित्तौड़ गढ़ दुर्ग में जलने वाली आग प्रखर, जब हाय, सहस्त्रों, तिल-तिल जल कर हो गई अमर...। डॉ. प्रीतम सिंह के मुताबिक सुकवि वाजपेयी जी के काव्य में मुहावरे और कहावतों का सुंदर प्रयोग है। मेरी इक्यावन कविताएं और कैदी कविराय की कुंडलियां में यह साफ दिखता है।
वहीं उनके काव्य में विदेशी शब्दों का सुंदर अलंकरण दिखता है। बेनकाब चेहरे, दाग बड़े गहरे, टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूं... में उर्दू और सैंतालीस में एमरजेंसी क्यों न लगाई, मीसा मंत्र महान, रौलट की संतान... जैसी रचनाओं में अंग्रेजी के शब्दों का कई जगह इस्तेमाल किया है।