हाथ नहीं- एक पैर से बिटिया ने बदला नसीब, रेस में गोल्ड
कहते हैं भगवान ऊपर से नसीब लिखकर भेजता है, लेकिन सोनीपत जिले की नसीबा ने बिना हाथ और एक पैर के अपने बुलंद हौसले से अपना नसीब लिखा है। रिपोर्ट - विजेंद्र कौशिक/सोनीपत
हाथ नहीं- एक पैर से बिटिया ने बदला नसीब, रेस में गोल्ड
पंचकूला में संपन्न हुई राज्यस्तरीय प्रतियोगिता में सातवीं की इस 12 वर्षीय छात्रा ने 100 मीटर की व्हीलचेयर रेस में गोल्ड मेडल हासिल किया है। कामयाबी से केवल उसका परिवार ही गदगद नहीं है बल्कि बहालगढ़ स्थित अशक्त बच्चों का स्कूल रेनू विद्या मंदिर भी अपनी होनहार बेटी के स्वागत की तैयारी कर रहा है।
हाथ नहीं- एक पैर से बिटिया ने बदला नसीब, रेस में गोल्ड
पेशे से भवन मिस्त्री शहाबुद्दीन परिवार सहित लंबे समय से रसोई गांव में रहता है। उसके चार बच्चे हैं। सबसे छोटी बेटी नसीबा के बचपन से ही कोहनी से नीचे दोनों हाथ और एक पैर नहीं है। मां बानो और पिता शहाबुद्दीन ने बेटी को विकलांगता को नसीब मानकर उसका नाम नसीबा रख दिया, लेकिन नसीबा के बुलंद हौसले के आगे आज सब कुछ बदल गया है।
हाथ नहीं- एक पैर से बिटिया ने बदला नसीब, रेस में गोल्ड
नसीबा न केवल अपना काम खुद करती है, बल्कि बेहद मनोहर चित्रकारी भी करती है। एक पैर से वह न केवल कंप्यूटर पर चित्रों में रंग भर लेती है, बल्कि मोबाइल पर गेम खेलने में भी निपुण है। यहां तक एक पैर से खाना बनाने के साथ-साथ बालों में कंघी भी कर लेती है।
हाथ नहीं- एक पैर से बिटिया ने बदला नसीब, रेस में गोल्ड
बेटी की कामयाबी पर पिता शहाबुद्दीन का कहना है कि उसे नसीबा की कामयाबी पर गर्व है। बचपन में विकलांगता को नसीब मानकर नाम नसीबा रख दिया था, लेकिन आज बेटी ने अपना नसीब अपने हाथ से लिखकर साबित कर दिया कि बेटियां किसी से कम नहीं हैं।