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देखिए, फौजी की बॉक्सर बेटी के मुक्के ने दिलाया अर्जुन अवार्ड

Tue, 09 Jun 2015 07:49 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, भिवानी
ब्यूरो/अमर उजाला, भिवानी Updated Tue, 09 Jun 2015 07:49 AM IST
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देखिए, फौजी की बॉक्सर बेटी के मुक्के ने दिलाया अर्जुन अवार्ड

haryana first arjun awardi lady boxer kavita chahal success story

पिता बॉक्सर थे। हादसे ने सेना की नौकरी भी छीनी और बाक्सिंग कैरियर भी खत्म। बेटी को रिंग में उतारा..तो उसने पिता का सपना सच कर दिया और बनी हरियाणा की पहली अर्जुन अवार्डी महिला बॉक्सर। देखिए तस्‍वीरें।


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भिवानी जिले के छोटे से गांव निमड़ी के भूपसिंह की बेटी कविता ने साबित कर दिया कि पुरुषों के दबदबे वाले इस खेल में वह भी कम नहीं है। यह एक बेटी का पिता के प्रति समर्पण था, भरोसे पर खरा उतरने का जज्बा था और खासकर उस प्रदेश में बेटियों के प्रति सोच में बदलाव का आगाज था, जहां उन्हें बेटों से कमतर आंका जाता रहा है।

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निमड़ी भी कुछ वर्षों पहले तक हरियाणा का एक आम गांव था, जिसमें बेटियों के प्रति सोच अन्य लोगों की ही तरह थी, लेकिन आज इस गांव की दुनिया में पहचान है और यह तमगा मिला बेटियों के कारण। दुनिया भर में मुक्कों का दम दिखाने वाली कविता चहल, पिंकी, नीतू सब इसी गांव की हैं। अब ये हर किसी की रोल मॉडल हैं। कल तक जो ताने देते थे, आज वे भी अपनी बेटियों को इनकी तरह बॉक्सर बनाना चाहते हैं।

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कविता चाहत के कैरियर की शुरुआत आसान नहीं रही। पिता भूपसिंह को बचपन से ही बॉक्सिंग का जुनून था। कई राष्ट्रीय स्पर्द्धाओं में मेडल बटोरे, सेना में भर्ती होने के बाद भी बॉक्सिंग के प्रति दीवानगी कम नहीं हुई, लेकिन एक हादसे में घायल होने के बाद नौकरी छोड़नी पड़ी और बॉक्सिंग का कॅरियर भी खत्म हो गया, सपने बिखर गए।

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हादसे के बाद भूपसिंह टूट से गए थे। सबसे छोटा बेटा 4-5 साल का था, दस साल तक इंतजार करने का धैर्य नहीं था। ऐसे में सबसे छोटी बेटी कविता को ही बॉक्सिंग के गुर सिखाने की ठानी। कविता ने भी साहस दिखाया, बाप की उम्मीदों को बिखरने नहीं दिया। रिंग में खेलने जाती तो लोगों के ताने झेले। घर छूटा, मगर हौसला नहीं टूटा। पूरी शिद्दत से कोशिश की और फिर इतिहास ही बदल दिया।

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