जानिए उस शख्स के बारे में, कहा जाता है कि अगर वो जरनैल सिंह भिंडरावाले के साथ न होता तो स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार न होता।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
- फोटो : फाइल फोटो
कहा जाता है कि जरनैल सिंह भिंडरावाले की असली ताकत भारतीय सेना से बर्खास्त किए गए मेजर जनरल सुबेग सिंह थे। अगर सुबेग सिंह का साथ भिंडरावाले को नहीं मिलता तो पंजाब के हालात ऐसे नहीं होते और 1984 में 3 से 6 जून तक तक वो ऑपरेशन न चलता। कहा जाता है कि सुबेग सिंह को रिटायरमेंट से एक दिन पहले बर्खास्त कर दिया गया था।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
- फोटो : बीबीसी
बर्खास्तगी को उसने अपना अपमान समझा और इसी का बदला लेने के लिए वह भिंडरावाले के साथ मिल गया। सुबेग सिंह ने भिंडरावाले से जुड़े लोगों को सैन्य प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। हथियार जुटाने में सुबेग ने बड़ी भूमिका निभाई। भारतीय सेना के इस अभियान की भनक भी उन्हें पहले से ही थी, इसलिए वे सब कई महीनों से तैयारी कर रहे थे, लेकिन सेना ने उन्हें मार गिराया।
6 जून 1984 को जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत के साथ ऑपरेशन ब्लूस्टार खत्म हुआ था। इस ऑपरेशन में 83 सैनिक मारे गए थे जिसमें 3 सेना के अफसर थे। इसके साथ ही कुल 248 लोग घायल हुए और 492 लोग मारे गए थे। दरअसल उस समय पंजाब को भारत से अलग करके अलग से खालिस्तान राष्ट्र बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी इसलिए इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था।
जरनैल सिंह भिंडरावाले सिखों की धार्मिक संस्था दमदमी टकसाल का लीडर था। उसकी कट्टर विचारधारा ने लोगों पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया था इसलिए उसे संस्था की कमान सौंपी गई थी। भिंडरावाले ने गोल्डन टैम्पल परिसर में बने अकाल तख्त में अपना मुख्यालय बना लिया और अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया था। अकाल तख्त पर कब्जे करने का विरोध भी हुआ, लेकिन भिंडरावाले ने इसकी चिंता नहीं की और हिंसा का दौर जारी रहा।