पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी जान देकर ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत चुकाई थी। 6 जून 1984 को हुए इस कांड में उनकी भूमिका अहम रही और वे इसके छह किरदारों में से एक थीं, जानिए कैसे?
ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। जनवरी 1980 में पार्टी को मिली जीत के बाद इंदिरा गांधी बतौर पीएम अपनी तीसरी पारी खेल रही थीं। उस वक्त पंजाब में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। इंदिरा का जरनैल सिंह भिंडरावाले से सियासी टकराव नहीं था, उनकी समस्या सियासी थी।
शिरोमणि अकाली दल पंजाब में मजबूत विकल्प के तौर पर उभर रहा था, लेकिन भिंडरावाले के दमदमी टकसाल पर हिंसा फैलाने के कई आरोप लगे। उसके बाद देश का सबसे समृद्ध राज्य सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसने लगा था। 5 अक्टूबर 1983 को हथियारबंद लोगों ने एक बस को अगवा कर लिया और उसमें सवार सभी हिंदुओं की हत्या कर दी। इंदिरा गांधी इस घटना से आगबबूला हो उठीं।
घटना के अगले ही दिन इंदिरा गांधी ने पंजाब में इमरजेंसी लगा दी। उन्होंने पंजाब में कांग्रेस के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह की सरकार को भंग करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने भिंडरवाले और उसके साथियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का मूड बना लिया। भिंडरावाले को गिरफ्तार करने की योजना थी, जिसकी भनक लगते ही वह अकाल तख्त में रहने लगा था। जनरल सुबेग भी उसके साथ आ गए थे।
इंदिरा गांधी ने रॉ के संस्थापक रामेश्वर नाथ काव और अपने सहयोगी आरके धवन से इस संबंध में चर्चा की। इस अलावा कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं के साथ चर्चा के दौरान इस पर सहमति बनी कि स्वर्ण मंदिर को भिंडरावाला समर्थकों से खाली कराने के लिए सेना की कार्रवाई की जाए। इस बीच, सरकार ने स्वर्ण मंदिर की घेराबंदी करने की योजना बनाई, क्योंकि भिंडरावाला ने अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया था।