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देखिए इस शख्स की वजह से हुआ था 'ऑपरेशन ब्लू स्टार', गुरुद्वारे में चली थीं गोलियां
Sun, 17 Jun 2018 09:51 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sun, 17 Jun 2018 09:51 AM IST
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
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ऑपरेशन ब्लू स्टार की 34वीं बरसीं पर जानिए उस शख्स के बारे में, जो अगर भिंडरावाले के साथ न होता तो स्वर्ण मंदिर में वो सब न होता। कहा जाता है कि जरनैल सिंह भिंडरावाले की असली ताकत भारतीय सेना से बर्खास्त किए गए मेजर जनरल सुबेग सिंह थे।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
अगर सुबेग सिंह का साथ भिंडरावाले को नहीं मिलता तो पंजाब के हालात ऐसे नहीं होते और 1984 में 3 से 6 जून तक तक वो ऑपरेशन न चलता। सुबेग सिंह को रिटायरमेंट से एक दिन पहले 2500 रुपए गबन के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था। बाद में कोर्ट ने इस मामले से बाइज्जत बरी कर दिया था। कहा जाता है कि सेना से रिटायरमेंट से एक दिन पहले बर्खास्तगी को उसने अपना अपमान समझा और इसी का बदला लेने के लिए भिंडरावाले के साथ मिल गया।
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ऑपरेशन ब्लू स्टार
भारतीय सेना से बर्खास्तगी के बाद वे भिंडरावाले के करीबी लोगों में शुमार हो गए। सुबेग सिंह ने भिंडरावाले से जुड़े लोगों को सैन्य प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। हथियार जुटाने में सुबेग ने बड़ी भूमिका निभाई। भारतीय सेना के इस अभियान की भनक भी उन्हें पहले से ही थी, इसलिए वे सब कई महीनों से तैयारी कर रहे थे, लेकिन सेना ने उन्हें मार गिराया।
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operation blue star
6 जून 1984 को जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत के साथ ऑपरेशन ब्लूस्टार खत्म हुआ था। इस ऑपरेशन में 83 सैनिक मारे गए थे जिसमें 3 सेना के अफसर थे। इसके साथ ही कुल 248 लोग घायल हुए और 492 लोग मारे गए थे। दरअसल उस समय पंजाब को भारत से अलग करके अलग से खालिस्तान राष्ट्र बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी इसलिए इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था।
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जरनैल सिंह भिंडरावाले सिखों की धार्मिक संस्था दमदमी टकसाल का लीडर था। उसकी कट्टर विचारधारा ने लोगों पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया था इसलिए उसे संस्था की कमान सौंपी गई थी। भिंडरावाले ने गोल्डन टैम्पल परिसर में बने अकाल तख्त में अपना मुख्यालय बना लिया और अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया था।
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