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सेना में रह चुके शख्स की जुबानी, युद्ध के दौरान जवानों की हालत की कहानी- न खाना मिलता न पानी
Thu, 28 Feb 2019 04:07 PM IST
खुशबू गोयल
विकास सैनी, अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा)
विकास सैनी, अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा)
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 28 Feb 2019 04:07 PM IST
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भारतीय सेना
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सेना में रह चुके, पाकिस्तान से तीन लड़ाइयां लड़ चुके शख्स की जुबानी सुनिए, युद्ध के दौरान जवानों की हालत की कहानी। वे कहते हैं, न खाना मिलता है और न पीने को पानी, पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें।
Indian Army
- फोटो : DEMO Pics
युद्ध, एक शब्द नहीं है। अपने आप में पूरी दास्तां है। देश को आर्थिक नुकसान ही नहीं होता, बल्कि अनगिनत लोग मारे जाते हैं। फिर भी अपने देश व जनता की रक्षा के लिए लड़ना पड़ता है। फिर वह भूखे रह कर ही क्यों न लड़ना पड़े। हमने ये दिन देखे नहीं, जिए हैं। पाकिस्तान से वर्ष 1965, 1971 व 1999 में हुई लड़ाई में मैंने न केवल हिस्सा लिया, बल्कि दुश्मन को नाकों चने चबवाए। इस दौरान सात-सात दिन बगैर खाए पीए, लड़े। यह कहना है आईटीबीपी के सेवानिवृत्त असिस्टेंट कमांडेंट राममेहर का।
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पाकिस्तान से लड़ चुका हूं तीन लड़ाई
पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट राममेहर ने बताया कि युद्ध लोगों के लिए एक शब्द होगा। सेना के जवानों के लिए पूरी कहानी है। मैंने एक नहीं तीन युद्ध लड़े हैं। पहला 1965 में राजौरी सेक्टर में पाकिस्तान के साथ। यह गोरिल्ला युद्ध था। उस समय मैं 22 साल का था। 19 साल की उम्र में भर्ती हो गया था। उस समय 1962 की चीन के साथ लड़ाई बंद हुई थी। इसके बाद वर्ष 1971 में थानाधार उड़ी सेक्टर व 1999 में कारगिल में बतौर सहायक लड़ाई लड़ी। ये आमने-सामने की लड़ाई थी।
पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट राममेहर ने बताया कि युद्ध लोगों के लिए एक शब्द होगा। सेना के जवानों के लिए पूरी कहानी है। मैंने एक नहीं तीन युद्ध लड़े हैं। पहला 1965 में राजौरी सेक्टर में पाकिस्तान के साथ। यह गोरिल्ला युद्ध था। उस समय मैं 22 साल का था। 19 साल की उम्र में भर्ती हो गया था। उस समय 1962 की चीन के साथ लड़ाई बंद हुई थी। इसके बाद वर्ष 1971 में थानाधार उड़ी सेक्टर व 1999 में कारगिल में बतौर सहायक लड़ाई लड़ी। ये आमने-सामने की लड़ाई थी।
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सात दिन बाद मिली सूखी रोटी पानी में भिगो कर खाई
राममेहर बताते हैं कि युद्ध के दौरान हालात बेहद खस्ता होते हैं। यहां सबसे पहले खाने-पीने की दिक्कत शुरू होती है। तीन लड़ाइयों में यह कड़वा सच बेहद करीब से समझा। वर्ष 1965 की लड़ाई अब भी याद है। हम सात दिन तक भूखे प्यासे लड़ते रहे। युद्ध के दौरान मैस बंद रही। सातवें दिन हैलीकॉप्टर ने आकाश से खाने के पैकेट गिराए। दुश्मन की गोलियों के बीच जमीन पर रेंगते हुए इन्हें किसी तरह इकट्ठा किया। इसमें सूखी रोटी, गुड़ व चने मिले। रोटी पानी में भिगो कर नरम की और गुड़-चने के साथ खाई। इसी खुराक के सहारे दुश्मन से लड़े।
राममेहर बताते हैं कि युद्ध के दौरान हालात बेहद खस्ता होते हैं। यहां सबसे पहले खाने-पीने की दिक्कत शुरू होती है। तीन लड़ाइयों में यह कड़वा सच बेहद करीब से समझा। वर्ष 1965 की लड़ाई अब भी याद है। हम सात दिन तक भूखे प्यासे लड़ते रहे। युद्ध के दौरान मैस बंद रही। सातवें दिन हैलीकॉप्टर ने आकाश से खाने के पैकेट गिराए। दुश्मन की गोलियों के बीच जमीन पर रेंगते हुए इन्हें किसी तरह इकट्ठा किया। इसमें सूखी रोटी, गुड़ व चने मिले। रोटी पानी में भिगो कर नरम की और गुड़-चने के साथ खाई। इसी खुराक के सहारे दुश्मन से लड़े।
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पहली लाइन में खड़े होते हैं पैरामिलिट्री के जवान
राममेहर बताते हैं कि पैरामिलिट्री देश की सीमाओं की सुरक्षा करती है। यह पहली लाइन में रहती है। दुश्मन की गोली चलती है या हमला होता है, तो पहला वार पैरामिलिट्री ही झेलती है। सेना तो हमसे दो किलोमीटर दूर रहती है। दुश्मन के एकदम सामने खड़े रहकर हम लड़ते हैं। युद्ध शुरू होने के बाद सेना आती है। इस बीच सीमाओं की सुरक्षा बीएसएफ, आईटीबीपी व आसाम राइफल के हवाले रहती है।
राममेहर बताते हैं कि पैरामिलिट्री देश की सीमाओं की सुरक्षा करती है। यह पहली लाइन में रहती है। दुश्मन की गोली चलती है या हमला होता है, तो पहला वार पैरामिलिट्री ही झेलती है। सेना तो हमसे दो किलोमीटर दूर रहती है। दुश्मन के एकदम सामने खड़े रहकर हम लड़ते हैं। युद्ध शुरू होने के बाद सेना आती है। इस बीच सीमाओं की सुरक्षा बीएसएफ, आईटीबीपी व आसाम राइफल के हवाले रहती है।