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9वीं पास शख्स यूं ही नहीं बन गए थे यूनिवर्सिटी प्रोफेसर, इनका फंडा अपनाइए, नहीं खाएंगे कभी मात
Fri, 20 Dec 2019 09:17 AM IST
खुशबू गोयल
रिंपी गुप्ता, अमर उजाला, पटियाला(पंजाब)
रिंपी गुप्ता, अमर उजाला, पटियाला(पंजाब)
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 20 Dec 2019 09:17 AM IST
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किरपाल कजाक
- फोटो : अमर उजाला
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अगर आप जीवन में सफल होना चाहते हैं, कैरियर की ऊंचाइयां छूना चाहते हैं तो यूनिवर्सिटी प्रोफेसर बने 9वीं इस शख्स का फंडा अपनाइए, कभी मात नहीं खाएंगे।
किरपाल कजाक
- फोटो : अमर उजाला
साहित्य अकादमी ने 2019 के पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। इस बार पुरस्कार पाने वालों में पंजाब के 76 वर्षीय कहानीकार प्रोफेसर किरपाल कजाक भी हैं। उन्हें यह पुरस्कार लघु कथा श्रेणी में पंजाबी के लिए दिया गया है। वे पाकिस्तान के शेखूपुरा में साल 1943 में एक गरीब परिवार में जन्मे थे। उनके पिता साधू सिंह पेशे से राजमिस्त्री थे। बंटवारे के बाद जब वे पटियाला आए तो परिवार के गुजारे के लिए किरपाल को साथ काम करने को कहा। इस पर वे नाराज होकर घर से भाग गए।
किरपाल कजाक
- फोटो : अमर उजाला
किरपाल सिंह का पढ़ाई में मन नहीं था। उन्होंने सिर्फ नौवीं तक पढ़ाई की। घर से भागने बाद वे जेबकतरों, खानाबदोशों और देश के विभिन्न आदिवासी कबीलों के लोगों के साथ रहे। इस दौरान उन्हें उनके बारे में जानने का मौका मिला। वे कभी घर आ जाते, फिर दोबारा भाग जाते। यह सिलसिला लगभग 10 साल चला। वे इन सभी अनुभवों को कॉपी पर लिखते थे। वर्ष 1970 में पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन पर आई तो मजबूरन उन्हें कभी कारपेंटर का काम और कभी मजदूरी करनी पड़ी।
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किरपाल कजाक
- फोटो : अमर उजाला
लेकिन उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। 1986 में उन्होंने पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में छोटी-मोटी नौकरी करनी शुरू कर दी। एक बार वे अमृता प्रीतम से मिले और उनकी सलाह पर उन्होंने इन सभी को किताबों में ढालना शुरू किया। उसके बाद उनकी ऐसी रचनाएं सामने आईं कि सभी आश्चर्यचकित रह गए। उनकी प्रतिभा का लोहा मानते हुए नौवीं पास किरपाल कजाक को पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला ने प्रोफेसर नियुक्त कर दिया। हालांकि वे इस पद पर डेढ़ माह तक ही रहे और 2002 में रिटायर हो गए।
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फाइल फोटो
जिंदगी जो सिखाती है, वह भी पढ़ाई है
अमर उजाला से खास बातचीत करते हुए प्रोफेसर किरपाल कजाक ने कहा कि पढ़ाई केवल किताबें-कॉपियों से नहीं होती। जिंदगी जो सिखाती है या तजुर्बे देती है, वह भी पढ़ाई है। उन्होंने गुरबत में जीवन बिताते हुए अपनी कला को ऊपर ले जाने के लिए तपस्या की, साधना की। इसके अलावा उन्हें जीवन में कुछ अच्छे लोगों का भी साथ मिला। इसकी वजह से आज वह यह मुकाम हासिल कर पाए हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार पाना उनके लिए बड़े गौरव की बात है। ऐसा लग रहा है कि आज तक जितनी भी मेहनत की, उसका फल मिल गया। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह लेखक बनेंगे। पिता राजमिस्त्री होने के साथ-साथ अरबी फारसी के विद्वान भी थे। पिता ने देखा कि पढ़ाई में उनकी रुचि नहीं है तो उन्होंने ही सबसे पहले साहित्यिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
अमर उजाला से खास बातचीत करते हुए प्रोफेसर किरपाल कजाक ने कहा कि पढ़ाई केवल किताबें-कॉपियों से नहीं होती। जिंदगी जो सिखाती है या तजुर्बे देती है, वह भी पढ़ाई है। उन्होंने गुरबत में जीवन बिताते हुए अपनी कला को ऊपर ले जाने के लिए तपस्या की, साधना की। इसके अलावा उन्हें जीवन में कुछ अच्छे लोगों का भी साथ मिला। इसकी वजह से आज वह यह मुकाम हासिल कर पाए हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार पाना उनके लिए बड़े गौरव की बात है। ऐसा लग रहा है कि आज तक जितनी भी मेहनत की, उसका फल मिल गया। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह लेखक बनेंगे। पिता राजमिस्त्री होने के साथ-साथ अरबी फारसी के विद्वान भी थे। पिता ने देखा कि पढ़ाई में उनकी रुचि नहीं है तो उन्होंने ही सबसे पहले साहित्यिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।