1965 के युद्ध में पाकिस्तान की भारतीय फौज के हाथों करारी हार हुई थी और पाकिस्तानी सैनिक अपने साथियों की लाशों को छोड़कर भाग गए थे, देखिए वो जगह।
जहां आज भी पाकिस्तान के नापाक इरादों के निशान मौजूद हैं। भले ही भारत आज कश्मीर की एक इंच जमीन भी पाकिस्तान को देने के लिए तैयार न हो। लेकिन भारत-पाकिस्तान बार्डर पर एक गांव ऐसा है, जिसे हासिल करने के लिए भारत ने अपने 12 गांव पाकिस्तान को दे दिए थे। यह गांव है पंजाब के जिला फिरोजपुर का गुलाम हुसैनीवाल जो पाक सीमा पर बसा हुआ है।
भारत ने इस गांव को विशेष रूप से पाकिस्तान से इसलिए लिया, क्योंकि यह शहीदों की निशानियों और देशवासियों की भावनाओं के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक था। शहीदे-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधियों के अलावा भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त की समाधि भी यहां पर है। इसके अलावा भगत सिंह की माता विद्यावती देवी, जिन्हें पंजाब माता का खिताब दिया गया था उनकी समाधि भी उनकी इच्छा के अनुसार यहीं पर है।
यहां पर हर साल 26 जनवरी और 15 अगस्त सहित अन्य राष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन कर देश के इन वीर जवानों को याद किया जाता है। कहते हैं कि 1965 में पाकिस्तानी सेना ने हर मोर्चे पर भारतीय फौज के हाथों करारी हार झेली थी और पाकिस्तानी सेना जलते टैंकों और अपने मरे हुए साथियों की लाशों को छोड़ कर भाग खड़ी हुई थी। 18 से 21 सितंबर तक 4 दिनों तक चले युद्ध के दौरान हुसैनीवाला गांव के लोगों ने सेना का पूरा साथ दिया।
पाकिस्तानी सेना ने 18-19 सितंबर 1695 की रात पूरी इंफेंट्री ब्रिगेड, टैंकों और हवाई हमले के साथ हुसैनीवाला बोर्डर पर हमला कर दिया था। उस समय हुसैनीवाला बोर्डर पर सेकेंड लाइट इंफेंट्री मराठा के जवानों ने मोर्चा संभाला हुआ था। देश के इन रणबांकुरों ने पाकिस्तानी टेंकों व फौज की परवाह किए बगैर पूरी मजबूती के साथ पाकिस्तानी सेना का मुंहतोड़ जवाब दिया और उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया।