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Ujjain News: शराबबंदी का असर काल भैरव पर नहीं, अब ऐसे लगाया जाएगा भोग, जानें क्यों चढ़ाई जाती है शराब?
Wed, 02 Apr 2025 01:57 PM IST
उज्जैन ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: उज्जैन ब्यूरो
Updated Wed, 02 Apr 2025 01:57 PM IST
सार
काल भैरव मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने बताया कि मंदिर में प्रतिदिन पांच बार भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है, जिसके पहले विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि काल भैरव तामसिक प्रवृत्ति के देवता हैं, इसी कारण उन्हें मदिरा का भोग लगाया जाता है।
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बाबा महाकाल के सेनापति हैं काल भैरव।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Kaal Bhairav Mandir Ujjain: मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में बाबा महाकाल के सेनापति काल भैरव का मंदिर है। इस मंदिर में काल भैरव को रोजाना मदिरा (शराब) का भोग लगाया जाता है। मध्यप्रदेश में 1 अप्रैल से धार्मिक स्थलों पर शराबबंदी किए जाने के बाद इस मंदिर में कई बड़े बदलाव हुए हैं। इसके तहत अब भगवान काल भैरव के शराब भोग का इंतजाम मंदिर प्रबंधन कर रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर काल भैरव को मदिरा का भोग क्यों लगाया जाता है, इसके पीछे की कहानी क्या है?
सबसे पहले जानिए, क्यों लगाया जाता है शराब का भोग?
इसे लेकर कई मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। कुछ किवदंतियों के अनुसार, मदिरा का भोग लगाने की शुरुआत राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी। राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में किसी ने उनकी पूजा में अनिष्ट करने के उद्देश्य से भोग में मदिरा मिला दी थी। जिसे चढ़ाने पर काल भैरव क्रोधित हो गए। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने विशेष पूजा-अर्चना की, जिससे भगवान प्रसन्न हुए और तब से उन्हें मदिरा चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई। वहीं, कुछ किवदंतियों के अनुसार, काल भैरव को तांत्रिकों का देवता भी माना जाता है। तांत्रिक क्रियाओं में मदिरा का उपयोग किया जाता था, यहीं से मदिरा का भोग लगाने की परंपरा शुरू हो गई।
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काल भैरव मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने बताया कि मंदिर में प्रतिदिन पांच बार भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है, जिसके पहले विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि काल भैरव तामसिक प्रवृत्ति के देवता हैं, इसी कारण उन्हें मदिरा का भोग लगाया जाता है। काल भैरव को मदिरा चढ़ाना संकल्प और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। काल भैरव मंदिर को लेकर यह दावा किया जाता है कि यहां चढ़ाई जाने वाली शराब स्वयं मूर्ति पी जाती है। मदिरा पीने की आवाज भी आती है और जिस पात्र में इसे डाला जाती है, वह खाली हो जाता है। लेकिन, शराब कहां जाती है, इसी जानकारी आज तक किसी को नहीं है।
नगर के सेनापति भी हैं काल भैरव
उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित इस मंदिर में भगवान शिव अपने भैरव स्वरूप में विराजमान हैं। वैसे तो भगवान शिव का भैरव स्वरूप रौद्र और तमोगुण प्रधान है, लेकिन काल भैरव अपने भक्तों की करुण पुकार सुनकर उनकी सहायता के लिए दौड़े चले आते हैं। काल भैरव मंदिर में मुख्य रूप से मदिरा ही प्रसाद के रूप में चढ़ती है। मंदिर के पुजारी भक्तों द्वारा चढ़ाई गई मदिरा को एक पात्र में डालकर भगवान के मुख से लगाते हैं और देखते ही देखते भक्तों की आंखों के सामने भगवान इसे ग्रहण कर लेते हैं। अघोरी तांत्रिकों के लिए काल भैरव की कालाष्टमी (भैरव अष्टमी) विशेष महत्व रखती है। वे पूरे वर्ष इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं। वहीं, सामान्य भक्त भी इस दिन भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। शहर से आठ किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यदि कोई उज्जैन आकर महाकाल के दर्शन करे और काल भैरव के दर्शन न करे तो उसे आधा लाभ ही प्राप्त होता है। ऐसे में बाबा महाकाल के बाद काल भैरव के दर्शन करने की भी मान्यता है। काल भैरव को बाबा महाकाल का सेनापति भी कहा जाता है।
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दूर-दूर से भोग-प्रसाद ला रहे श्रद्धालु
काल भैरव के मंदिर में रोजाना भक्तों का तांता लगा रहता है। लेकिन, शराबबंदी के कारण मंदिर में दर्शन करने के लिए आने वाले भक्तों को शराब नहीं मिल रही है। ऐसे में बुधवार सुबह मंदिर में दर्शन करने पहुंचे कई भक्त अपने साथ शराब लेकर आए थे। उन्होंने बताया कि उन्हें शराबबंदी की जानकारी मिली थी, इसलिए वे अपने साथ शराब लेकर आए हैं। वहीं, कुछ भक्तों को मंदिर आकर पता चला कि अब शराब नहीं मिल रही है। ऐसे उन्होंने भगवान को चने, चिरौंजी और नारियल का प्रसाद चढ़ाया।
मंदिर की तस्वीरें...
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सबसे पहले जानिए, क्यों लगाया जाता है शराब का भोग?
इसे लेकर कई मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। कुछ किवदंतियों के अनुसार, मदिरा का भोग लगाने की शुरुआत राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में हुई थी। राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में किसी ने उनकी पूजा में अनिष्ट करने के उद्देश्य से भोग में मदिरा मिला दी थी। जिसे चढ़ाने पर काल भैरव क्रोधित हो गए। इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने विशेष पूजा-अर्चना की, जिससे भगवान प्रसन्न हुए और तब से उन्हें मदिरा चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई। वहीं, कुछ किवदंतियों के अनुसार, काल भैरव को तांत्रिकों का देवता भी माना जाता है। तांत्रिक क्रियाओं में मदिरा का उपयोग किया जाता था, यहीं से मदिरा का भोग लगाने की परंपरा शुरू हो गई।
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काल भैरव मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश चतुर्वेदी ने बताया कि मंदिर में प्रतिदिन पांच बार भगवान को मदिरा का भोग लगाया जाता है, जिसके पहले विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि काल भैरव तामसिक प्रवृत्ति के देवता हैं, इसी कारण उन्हें मदिरा का भोग लगाया जाता है। काल भैरव को मदिरा चढ़ाना संकल्प और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। काल भैरव मंदिर को लेकर यह दावा किया जाता है कि यहां चढ़ाई जाने वाली शराब स्वयं मूर्ति पी जाती है। मदिरा पीने की आवाज भी आती है और जिस पात्र में इसे डाला जाती है, वह खाली हो जाता है। लेकिन, शराब कहां जाती है, इसी जानकारी आज तक किसी को नहीं है।
नगर के सेनापति भी हैं काल भैरव
उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित इस मंदिर में भगवान शिव अपने भैरव स्वरूप में विराजमान हैं। वैसे तो भगवान शिव का भैरव स्वरूप रौद्र और तमोगुण प्रधान है, लेकिन काल भैरव अपने भक्तों की करुण पुकार सुनकर उनकी सहायता के लिए दौड़े चले आते हैं। काल भैरव मंदिर में मुख्य रूप से मदिरा ही प्रसाद के रूप में चढ़ती है। मंदिर के पुजारी भक्तों द्वारा चढ़ाई गई मदिरा को एक पात्र में डालकर भगवान के मुख से लगाते हैं और देखते ही देखते भक्तों की आंखों के सामने भगवान इसे ग्रहण कर लेते हैं। अघोरी तांत्रिकों के लिए काल भैरव की कालाष्टमी (भैरव अष्टमी) विशेष महत्व रखती है। वे पूरे वर्ष इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं। वहीं, सामान्य भक्त भी इस दिन भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। शहर से आठ किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यदि कोई उज्जैन आकर महाकाल के दर्शन करे और काल भैरव के दर्शन न करे तो उसे आधा लाभ ही प्राप्त होता है। ऐसे में बाबा महाकाल के बाद काल भैरव के दर्शन करने की भी मान्यता है। काल भैरव को बाबा महाकाल का सेनापति भी कहा जाता है।
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दूर-दूर से भोग-प्रसाद ला रहे श्रद्धालु
काल भैरव के मंदिर में रोजाना भक्तों का तांता लगा रहता है। लेकिन, शराबबंदी के कारण मंदिर में दर्शन करने के लिए आने वाले भक्तों को शराब नहीं मिल रही है। ऐसे में बुधवार सुबह मंदिर में दर्शन करने पहुंचे कई भक्त अपने साथ शराब लेकर आए थे। उन्होंने बताया कि उन्हें शराबबंदी की जानकारी मिली थी, इसलिए वे अपने साथ शराब लेकर आए हैं। वहीं, कुछ भक्तों को मंदिर आकर पता चला कि अब शराब नहीं मिल रही है। ऐसे उन्होंने भगवान को चने, चिरौंजी और नारियल का प्रसाद चढ़ाया।
मंदिर की तस्वीरें...



