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खजुराहो: जवारी मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु की खंडित प्रतिमा को मिलेगा मस्तक, प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू
Tue, 06 Oct 2026 04:55 PM IST
दिनेश शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: दिनेश शर्मा
Updated Tue, 06 Oct 2026 04:55 PM IST
सार
खजुराहो के जवारी मंदिर में स्थापित 11वीं सदी की भगवान विष्णु की खंडित प्रतिमा को मूल स्वरूप देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। एएसआई ने तकनीकी अध्ययन के लिए विशेषज्ञों की टीम गठित की है। करीब सात फीट ऊंची बलुआ पत्थर की प्रतिमा का गायब मस्तक वैज्ञानिक जांच के बाद जोड़ने की तैयारी है।
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खजुराहो में प्रसिद्ध जवारी मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु की ग्यारहवीं सदी की प्राचीन खंडित प्रतिमा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित प्रसिद्ध जवारी मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु की ग्यारहवीं सदी की प्राचीन खंडित प्रतिमा को पुनः उसका पूर्ण स्वरूप प्रदान करने की ऐतिहासिक पहल आरंभ हो गई है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित खजुराहो स्मारक समूह के इस प्रमुख मंदिर में स्थापित भगवान विष्णु की लगभग सात फीट ऊंची बलुआ पत्थर की प्रतिमा का मस्तक लंबे समय से गायब है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस ऐतिहासिक धरोहर का मस्तक पुनः जोड़कर इसे मूल रूप में बहाल करने की बहुप्रतीक्षित प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू कर दी है।
तकनीकी अध्ययन के लिए विशेष दल गठित
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संयुक्त महानिदेशक एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. नंदिनी भट्टाचार्य ने प्रतिमा की बहाली प्रक्रिया शुरू होने की आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बहुमूल्य पुरातात्विक धरोहर की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रतिमा को जोड़ने का काम किसी भी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं किया जाएगा। किसी भी प्रत्यक्ष भौतिक कार्य से पूर्व प्रतिमा की गहन तकनीकी जांच और आवश्यक वैज्ञानिक परीक्षण संपन्न किए जाएंगे। संरक्षण कार्य को सुचारु रूप से संचालित करने के उद्देश्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक विशेष कार्यदल गठित किया गया है। यह विशेषज्ञ टीम शीघ्र ही खजुराहो पहुंचकर जवारी मंदिर का प्रत्यक्ष अवलोकन करेगी। निरीक्षण के दौरान टीम प्रतिमा की वर्तमान स्थिति, बलुआ पत्थर की रासायनिक व भौतिक संरचना तथा मस्तक को पुनः सुरक्षित रूप से जोड़ने की सभी तकनीकी संभावनाओं का विस्तार से अध्ययन करेगी। इस विस्तृत वैज्ञानिक जांच के पश्चात ही बहाली की अगली प्रक्रिया का खाका तैयार किया जाएगा।
ये भी पढ़ें- आस्था, कला और हुनर का संगम: सागर में 50 साल से बन रही दुर्गा प्रतिमाएं, देशभर में रहती है डिमांड
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चंदेलकालीन कला का अनमोल प्रतीक
खजुराहो का जवारी मंदिर और वहां स्थापित भगवान विष्णु की यह सात फीट ऊंची प्रतिमा चंदेलकालीन कला तथा स्थापत्य शैली की उत्कृष्ट पहचान मानी जाती है। वर्तमान में बलुआ पत्थर से निर्मित इस मूर्ति का धड़, चारों भुजाएं और पैर पूरी तरह सुरक्षित अवस्था में मौजूद हैं, परंतु इसका सिर अनुपस्थित है। भारतीय कला इतिहास में खजुराहो में स्थित प्रत्येक मंदिर और मूर्ति को एक अनमोल सांस्कृतिक विरासत का दर्जा प्राप्त है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के इस ऐतिहासिक कदम से यह उम्मीद प्रबल हो गई है कि जवारी मंदिर की यह प्राचीन प्रतिमा आने वाले समय में अपने पूरे कलात्मक सौंदर्य के साथ दिखाई दे सकेगी। हालांकि, पुरातात्विक धरोहरों के मूल वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार संरक्षण और बहाली के ऐसे जटिल कार्यों में पर्याप्त समय लगने की संभावना बनी रहती है। विशेषज्ञों द्वारा की जाने वाली सभी तकनीकी जांच और अध्ययन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मूर्ति का सिर जोड़ने का कार्य अंतिम रूप से संपादित किया जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय में उठा था मुद्दा
भगवान विष्णु की यह ऐतिहासिक प्रतिमा लगभग एक वर्ष पूर्व देश की सर्वोच्च अदालत में भी विशेष चर्चा का विषय बनी थी। प्रतिमा के संरक्षण, सुरक्षा तथा इसके मूल ऐतिहासिक स्वरूप से जुड़े विवाद के बीच अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से पुनर्निर्माण व बहाली की प्रक्रिया का श्रीगणेश किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।जवारी मंदिर की इस भगवान विष्णु प्रतिमा को मस्तक मिलने के बाद इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कलात्मक प्रस्तुति और अधिक पूर्ण हो सकेगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा प्रारंभ की गई इस योजना से न केवल देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को प्रतिमा का संपूर्ण दर्शन प्राप्त होगा, बल्कि यह कदम खजुराहो की प्राचीन स्थापत्य कला के संरक्षण में भी मील का पत्थर सिद्ध होगा।
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तकनीकी अध्ययन के लिए विशेष दल गठित
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की संयुक्त महानिदेशक एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. नंदिनी भट्टाचार्य ने प्रतिमा की बहाली प्रक्रिया शुरू होने की आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बहुमूल्य पुरातात्विक धरोहर की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रतिमा को जोड़ने का काम किसी भी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं किया जाएगा। किसी भी प्रत्यक्ष भौतिक कार्य से पूर्व प्रतिमा की गहन तकनीकी जांच और आवश्यक वैज्ञानिक परीक्षण संपन्न किए जाएंगे। संरक्षण कार्य को सुचारु रूप से संचालित करने के उद्देश्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक विशेष कार्यदल गठित किया गया है। यह विशेषज्ञ टीम शीघ्र ही खजुराहो पहुंचकर जवारी मंदिर का प्रत्यक्ष अवलोकन करेगी। निरीक्षण के दौरान टीम प्रतिमा की वर्तमान स्थिति, बलुआ पत्थर की रासायनिक व भौतिक संरचना तथा मस्तक को पुनः सुरक्षित रूप से जोड़ने की सभी तकनीकी संभावनाओं का विस्तार से अध्ययन करेगी। इस विस्तृत वैज्ञानिक जांच के पश्चात ही बहाली की अगली प्रक्रिया का खाका तैयार किया जाएगा।
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चंदेलकालीन कला का अनमोल प्रतीक
खजुराहो का जवारी मंदिर और वहां स्थापित भगवान विष्णु की यह सात फीट ऊंची प्रतिमा चंदेलकालीन कला तथा स्थापत्य शैली की उत्कृष्ट पहचान मानी जाती है। वर्तमान में बलुआ पत्थर से निर्मित इस मूर्ति का धड़, चारों भुजाएं और पैर पूरी तरह सुरक्षित अवस्था में मौजूद हैं, परंतु इसका सिर अनुपस्थित है। भारतीय कला इतिहास में खजुराहो में स्थित प्रत्येक मंदिर और मूर्ति को एक अनमोल सांस्कृतिक विरासत का दर्जा प्राप्त है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के इस ऐतिहासिक कदम से यह उम्मीद प्रबल हो गई है कि जवारी मंदिर की यह प्राचीन प्रतिमा आने वाले समय में अपने पूरे कलात्मक सौंदर्य के साथ दिखाई दे सकेगी। हालांकि, पुरातात्विक धरोहरों के मूल वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार संरक्षण और बहाली के ऐसे जटिल कार्यों में पर्याप्त समय लगने की संभावना बनी रहती है। विशेषज्ञों द्वारा की जाने वाली सभी तकनीकी जांच और अध्ययन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मूर्ति का सिर जोड़ने का कार्य अंतिम रूप से संपादित किया जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय में उठा था मुद्दा
भगवान विष्णु की यह ऐतिहासिक प्रतिमा लगभग एक वर्ष पूर्व देश की सर्वोच्च अदालत में भी विशेष चर्चा का विषय बनी थी। प्रतिमा के संरक्षण, सुरक्षा तथा इसके मूल ऐतिहासिक स्वरूप से जुड़े विवाद के बीच अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से पुनर्निर्माण व बहाली की प्रक्रिया का श्रीगणेश किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।जवारी मंदिर की इस भगवान विष्णु प्रतिमा को मस्तक मिलने के बाद इसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कलात्मक प्रस्तुति और अधिक पूर्ण हो सकेगी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा प्रारंभ की गई इस योजना से न केवल देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को प्रतिमा का संपूर्ण दर्शन प्राप्त होगा, बल्कि यह कदम खजुराहो की प्राचीन स्थापत्य कला के संरक्षण में भी मील का पत्थर सिद्ध होगा।
