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अदालत: अवैध उत्खनन पर साढ़े चार सौ करोड़ के प्रस्तावित जुर्माने में राहत नहीं, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

Wed, 16 Sep 2026 10:50 PM IST
जबलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर Published by: जबलपुर ब्यूरो Updated Wed, 16 Sep 2026 10:50 PM IST
सार

जबलपुर हाईकोर्ट ने अवैध उत्खनन के मामले में मेसर्स आनंद माइनिंग कॉर्पोरेशन की याचिका खारिज कर दी। कंपनी पर करीब 443 करोड़ रुपये की वसूली प्रस्तावित है। कोर्ट ने जिला कलेक्टर को शो-कॉज नोटिस की कार्रवाई पूरी कर चार माह में प्रकरण का कानून के अनुसार निराकरण करने के निर्देश दिए हैं।

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No relief regarding the proposed ₹450 crore fine for illegal mining.
मप्र हाईकोर्ट

विस्तार

जबलपुर। अवैध उत्खनन के मामले में प्रस्तावित साढ़े चार सौ करोड़ रुपये के जुर्माने की कार्यवाही के खिलाफ मेसर्स आनंद माइनिंग कॉर्पाेरेशन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट जस्टिस आनंद पाठक व जस्टिस वीपी शर्मा की युगलपीठ ने सुनवाई के बाद याचिका को खारिज कर दिया। युगलपीठ ने जिला कलेक्टर को चार माह के भीतर प्रकरण का निराकरण करने निर्देश जारी किए हैं।

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याचिकाकर्ता कंपनी मेसर्स आनंद माइनिंग कॉर्पाेरेशन की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि उनके द्वारा जबलपुर की तहसील सिहोरा के अंतर्गत आने वाले गांव टिकरिया और गांव प्रतापपुर में स्थित लौह अयस्क खदानों के लिए माइनिंग लीज के आधार पर खनन कार्य किया जा रहा है। टिकरिया ग्राम में 20.002 हेक्टेयर जमीन की माइनिंग लीज़ 2 अप्रैल1987 से 1 अप्रैल 2037 तक की अवधि के लिए दी गई थी। इसी प्रकार ग्राम प्रतापपुर में क्षेत्रफल 11.578 हेक्टेयर क्षेत्रफल 21 जुलाई 1978 से 20 जुलाई 2028 तक की अवधि के लिए दी गई थी। राज्य सरकार ने 23 अप्रैल 2025 के आदेश के तहत एक जांच समिति का गठन किया, जिसने 2004-2017 की अवधि के दौरान कथित तौर पर निर्धारित से अधिक खनन के बारे में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट के आधार पर उनकी कंपनी को 2025 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। टिकरिया खदान में 1,13,81,94,280/- तथा प्रतापपुर के मामले में 1,20,69,41,910 रुपये की वसूली का प्रस्ताव दिया गया है।
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याचिका में कहा गया था कि पूरी कार्यवाही अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर मनमानी तरीके व कानून के खिलाफ की गई है। जांच समिति का गठन किसी कानूनी प्रावधान या सही तरीके से सौंपे गए कानूनी अधिकार के तहत नहीं किया गया है। इसलिए उनकी रिपोर्ट माइनिंग एक्ट, 1957 की धारा 21(5) के तहत कार्यवाही का आधार नहीं बन सकती। यह तर्क दिया गया है कि धारा 21(5) खनिज की कीमत, रॉयल्टी या टैक्स वसूलने की शक्ति राज्य सरकार को देती है और कलेक्टर बिना किसी खास अधिकार के ऐसा अधिकार-क्षेत्र नहीं अपना सकते।
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सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि कार्यवाही पूरी होने के बाद याचिकाकर्ता के पास एक प्रभावी कानूनी उपाय है। इसमें लागू खनन कानून के तहत उचित अपील का उपाय भी शामिल है। याचिकाकर्ता को पहले कलेक्टर के सामने कार्यवाही में शामिल होना चाहिए। याचिकाकर्ता का यह दावा है कि जांच रिपोर्ट में ही कलेक्टर को पूरी रकम वसूलने का निर्देश दिया गया है, तथ्यों के हिसाब से गलत है। रिपोर्ट याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अंतिम फैसला या वसूली का आदेश नहीं है, बल्कि यह सिर्फ़ इस नतीजे को दर्ज करती है कि सक्षम अधिकारी के सामने कार्यवाही के अधीन जीएसटी के साथ 4,43,04,86,890/- रुपये की रकम जमा करना उचित होगा। याचिकाकर्ता पर अभी तक कोई अंतिम दायित्व नहीं डाला गया है। याचिकाकर्ता का जवाब सुनने और सभी संबंधित पक्षों की बात सुनने के बाद जिला कलेक्टर कानून के अनुसार विवाद पर फैसला करने के लिए सक्षम है। याचिकाकर्ता का अपना अंतरिम जवाब भी बताता है कि कलेक्टर के सामने कारण बताओ नोटिस पर अभी भी बहस चल रही है और याचिकाकर्ता ने उसमें अपनी आपत्तियां उठाई हैं।

युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि कलेक्टर के सामने अभी शो-कॉज नोटिस की कार्रवाई चल रही है। अधिक खनन, राशि की गणना और कानून से जुड़े सवालों पर पहले सक्षम अधिकारी को निर्णय करना है। जांच रिपोर्ट कलेक्टर के लिए बाध्यकारी नहीं है। कलेक्टर कंपनी की आपत्तियां, जांच रिपोर्ट और संबंधित रिकार्ड देखकर कानून के अनुसार स्वतंत्र फैसला करेंगे। अंतिम आदेश से असंतुष्ट होने पर कंपनी को उपलब्ध वैधानिक अपील का अधिकार रहेगा।

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