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MP: जज को फोन-मैसेज करना पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने विधायक संजय पाठक को आपराधिक अवमानना का दोषी माना
Wed, 22 Jul 2026 08:51 PM IST
जबलपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर
Published by: जबलपुर ब्यूरो
Updated Wed, 22 Jul 2026 08:51 PM IST
सार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जज को फोन और मैसेज भेजने के मामले में भाजपा विधायक संजय पाठक को आपराधिक अवमानना का दोषी माना। हालांकि, बिना शर्त माफीनामा स्वीकार करते हुए अदालत ने चेतावनी देकर याचिका का निपटारा कर दिया।
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संजय पाठक
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भाजपा विधायक संजय पाठक को आपराधिक अवमानना का दोषी माना है। हालांकि, अदालत ने उनका बिना शर्त माफीनामा स्वीकार करते हुए चेतावनी देकर मामले का निपटारा कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी लंबित मामले से जुड़े व्यक्ति को संबंधित न्यायाधीश से मिलने, फोन करने या संदेश भेजने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
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मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने की। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि संजय पाठक का कृत्य आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है, लेकिन यह ऐसी प्रकृति का नहीं था जिससे न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर बाधा उत्पन्न हुई हो। इसलिए बिना शर्त माफी स्वीकार करते हुए उन्हें भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने की चेतावनी दी गई।
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दरअसल, कटनी निवासी आशुतोष दीक्षित द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि विधायक संजय पाठक से संबंधित कंपनी के खिलाफ अवैध उत्खनन से जुड़े करीब 1200 करोड़ रुपये की रिकवरी का मामला हाईकोर्ट में लंबित है। इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा ने 1 सितंबर 2025 को स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया था। उन्होंने अपने आदेश में उल्लेख किया था कि विधायक ने उनसे फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया था। इसके बाद उन्होंने पूरा मामला प्रशासनिक स्तर पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने के निर्देश दिए थे। बाद में हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को इस मामले का संज्ञान लेते हुए संजय पाठक के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए थे।
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अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान संजय पाठक ने बिना शर्त माफी मांगते हुए हलफनामा प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संबंधित न्यायाधीश को उनसे गलती से फोन लग गया था। गलती का एहसास होते ही उन्होंने कॉल काट दी और केवल शिष्टाचारवश अपना परिचय देते हुए एक संदेश भेजा। उनका कहना था कि न्यायाधीश से किसी प्रकार की बातचीत नहीं हुई और न ही न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का उनका कोई इरादा था। उन्होंने न्यायपालिका के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए अपनी भूल स्वीकार की।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि अदालत की अवमानना अधिनियम की धारा 13 के तहत सजा तभी दी जा सकती है, जब अवमानना से न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर बाधा उत्पन्न हुई हो या ऐसी बाधा उत्पन्न होने की स्पष्ट संभावना हो। अदालत ने माना कि इस मामले में आरोप केवल न्यायाधीश से संपर्क करने के प्रयास तक सीमित था और आरोपी ने अपनी गलती स्वीकार कर ली है।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी लंबित मामले से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े व्यक्ति को उस न्यायाधीश से मिलने, फोन करने या संदेश भेजने का प्रयास नहीं करना चाहिए, जो उस मामले की सुनवाई कर रहा हो या करने वाला हो। ऐसे कृत्य न्यायपालिका की गरिमा के विपरीत हैं और आपराधिक अवमानना की परिभाषा में आते हैं। हालांकि, बिना शर्त माफीनामा स्वीकार करते हुए अदालत ने संजय पाठक को भविष्य के लिए चेतावनी देकर याचिका का निपटारा कर दिया।
