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नाड़ी विद्या को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने की तैयारी: विशेषज्ञ बोले-एआई मददगार लेकिन वैद्य का अनुभव जरूरी

Tue, 06 Oct 2026 06:10 PM IST
Sandeep Kumar Tiwari न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क,अमर उजाला, भोपाल Published by: Sandeep Kumar Tiwari Updated Tue, 06 Oct 2026 06:10 PM IST
सार

नाड़ी विश्लेषण-2026 में विशेषज्ञों ने नाड़ी परीक्षण को परंपरा से निकालकर वैज्ञानिक अध्ययन से जोड़ने पर जोर दिया। कहा कि एआई नाड़ी के पैटर्न समझने में मदद कर सकता है, लेकिन वैद्य के अनुभव और मानवीय स्पर्श का विकल्प नहीं है। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि नाड़ी परीक्षण से मिले संकेतों की पुष्टि आधुनिक चिकित्सा जांच से जरूरी है।

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Preparations underway to test the science of *Nadi Pariksha* (pulse diagnosis) against scientific benchmarks;
राष्ट्रीय संगोष्ठी नाड़ी विश्लेषण-2026 में पहुंचे राज्यपाल मंगूभाई पटेल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नाड़ी परीक्षण की पारंपरिक विधा को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक अध्ययन से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। भोपाल के खुशीलाल आयुर्वेद संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी नाड़ी विश्लेषण-2026 में देशभर से आए विशेषज्ञों ने कहा कि नाड़ी देखकर शरीर में होने वाले असंतुलन के संकेतों को समझने की परंपरा है, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर स्वीकार्य बनाने के लिए इसके निष्कर्षों को वैज्ञानिक तरीके से दर्ज और प्रमाणित करना जरूरी है। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता नाड़ी परीक्षण में सहायता कर सकती है, लेकिन वैद्य के अनुभव और स्पर्श की जगह नहीं ले सकती।  संस्थान और राष्ट्रीय आयुष मिशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में राज्यपाल मंगूभाई पटेल, विधायक भगवानदास सबनानी, आयुष विभाग के प्रमुख सचिव शोभित जैन, आयुष आयुक्त आर. उमा महेश्वरी और संस्थान के प्राचार्य डॉ. उमेश शुक्ला सहित देशभर के विशेषज्ञ और बड़ी संख्या में विद्यार्थी शामिल हुए।
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सिर्फ बीमारी नहीं, शरीर के असंतुलन को समझने पर जोर
विशेषज्ञों के मुताबिक नाड़ी परीक्षण का इस्तेमाल बीमारी सामने आने के बाद ही नहीं, बल्कि शरीर में उससे पहले होने वाले बदलावों को समझने के लिए भी किया जाता है। आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ की स्थिति के आधार पर प्रकृति और विकृति का आकलन करने की परंपरा बताई गई। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि नाड़ी परीक्षण को आधुनिक चिकित्सा जांच का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। नाड़ी से मिले संकेतों के साथ पैथोलॉजी और दूसरी जरूरी जांचों की रिपोर्ट को देखकर ही चिकित्सकीय निर्णय लिया जाना चाहिए।
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तीन उंगलियों से वात-पित्त-कफ का आकलन
संगोष्ठी में बताया गया कि पारंपरिक पद्धति में तर्जनी, मध्यमा और अनामिका उंगली से क्रमश: वात, पित्त और कफ की स्थिति महसूस करने की बात कही गई है। नाड़ी की गति और स्वरूप के आधार पर शरीर की स्थिति समझने का प्रयास किया जाता है। विशेषज्ञों ने कुछ नाड़ी पैटर्न को मधुमेह जैसे चयापचय संबंधी विकार, अम्लता, त्वचा संबंधी परेशानी, दर्द और कब्ज जैसी स्थितियों के संकेतों से जोड़ने की जानकारी दी। हालांकि उन्होंने दोहराया कि इनकी पुष्टि के लिए आधुनिक जांच जरूरी है।
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36 बीमारियों के पैटर्न पहचानने का दावा
संगोष्ठी में एक नाड़ी विशेषज्ञ ने करीब 36 बीमारियों और स्वास्थ्य स्थितियों के अलग-अलग नाड़ी पैटर्न पहचानने का दावा किया। उन्होंने बताया कि किसी पैटर्न को मान्य मानने से पहले कम से कम 20 मरीजों पर उसके अनुभव का इंतजार किया जाता है। इस विषय पर उनका शोध पत्र प्रकाशित हो चुका है और पुस्तक भी लिखी गई है। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे अनुभवों को आयुर्वेद कॉलेजों के पाठ्यक्रम और शोध से जोड़ा जाए, ताकि अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे वैद्य नए पैटर्न की पहचान कर सकें और उनका वैज्ञानिक अध्ययन हो।

एआई से डेटा मिलेगा, फैसला वैद्य के अनुभव से
उत्तराखंड के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी वैद्य नवीन चंद्र जोशी ने कहा कि तकनीक नाड़ी परीक्षण को दर्ज करने, पैटर्न समझने और उसका विश्लेषण करने में मदद कर सकती है, लेकिन शरीर और भावनाओं से जुड़े पहलुओं को केवल डेटा के आधार पर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसलिए एआई को सहायक के रूप में देखा जाना चाहिए, वैद्य के विकल्प के रूप में नहीं। उन्होंने कहा कि नाड़ी परीक्षण में लगातार अभ्यास जरूरी है और विशेषज्ञता अनुभव से विकसित होती है। उनके अनुसार सुबह का समय नाड़ी परीक्षण के लिए उपयुक्त माना जाता है।


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भूख से नहीं, घड़ी देखकर खा रहे लोग
वैद्य सुशांत मिश्रा ने बदलती जीवनशैली को भोजन संबंधी समस्याओं से जोड़ा। उन्होंने कहा कि आज लोग कई बार भूख के बजाय समय और स्वाद देखकर खाना खाते हैं। घरों में नमकीन, बिस्किट, मिठाई और चॉकलेट जैसी चीजें आसानी से उपलब्ध होने से लगातार कुछ न कुछ खाते रहने की आदत बढ़ी है। उन्होंने कहा कि एक भोजन पचने से पहले दूसरा भोजन करना ओवरईटिंग की बड़ी वजह बन सकता है। भोजन के बाद लगातार भारीपन महसूस होना भी इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर ने भोजन को ठीक से स्वीकार नहीं किया।





 
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